Saturday, 30 May 2020

Online Charities

Important questions are, feeding whom and where, helping whom exactly and where, collected how much funds and spent where? None of the online charities will ever answer these questions for very obvious reasons. 

Millions of rupees donated by good hearted people are swindled by innumerable Charity middlemen. 

Charity frauds are rampant as almost no online charity organization is checked by government for sinister and unforgivable charity frauds. 

These so called charities disclose nothing, get nothing audited by government and aren't under RTI act. Thuggery goes on. 

Hence don't donate a penny to any online charities, rather donate directly to the poor and needy around you.

Friday, 29 May 2020

Sai Baba

#चाँद_मियां__उर्फ़__साईं_बाबा (1835-1918)
  बाप : बदरुद्दीन (अफगान)
  माँ : (अहमद नगर)
🔸️'चांद मियां उर्फ साईं बाबा' एक ऐसा षड्यंत्र है जिसे इस्लामिक वर्ल्ड की ओर से भरपूर आर्थिक सहयोग मिल रहा है ।  इसे यूँ समझिए कि साईं बाबा के प्रचारकों ने पहले तो शिर्डी में उनके मजार पर एक मंदिर बनाया । फिर उसकी  देखरेख के लिए एक संस्थान बनाया । नाम दिया "शिर्डी साँईं संस्थान" ।  इसी संस्थान से वे अपने षडयंत्रों का संचालन करते रहे। मात्र पैंतीस से चालीस सालों में इस्लामिक फाउंडेशनों की पर्दे के पीछे से की जा रही फंडिंग के कहलाते इस साईं संस्थान ने पूरे भारतवर्ष के अनेको सनातनी हिन्दू मंदिरों में अपनी पैठ बना ली ।  साथ ही साथ इन मंदिरों के प्रांगण में और इससे इतर भी गल्फ से आ रहे पैसों के बल पर भी साईं बाबा के नाम और मूर्तियों वाले मंदिर भी बना लिए । इसके बाद इन्होंने हिन्दू देवी देवताओं को साँईं के नाम से जोड़ना शुरू कर दिया जैसे साँईं राम , साँईं कृष्ण , साँईं शिव , साईं गणेश आदि आदि-आदि। 

सनातनी हिन्दुओं ने उनका प्रतिकार नहीं किया क्योंकि वे षड्यंत्र कारी हमारे बीच के ही थे। हमे यह जानना बहुत जरूरी है कि विदेशी ताकतों के द्वारा हिंदुओं को समाप्त करने के विदेशियों के उद्देश्य में यह संस्थान अपना अमूल्य योगदान पूरी ताकत से दे रहा है। 

जिस प्रकार से इसाई एवं इस्लाम के प्रचार के लिए विदेशी फंड यहाँ के कई संस्थानों को उपलब्ध कराया जाता है ठीक उसी प्रकार इस संस्थान को भी बेनामी दान दाताओं के द्वारा अकूत धन उपलब्ध उपलब्ध कराया जाता है। यह धन आगे हिंदुओं के मंदिरों में और अन्य मौजिज लोगों को बांट दिया जाता है ।

इसे आप यूँ भी समझें हमारे अनेको मंदिर जहां वित्तीय परेशानियों से जुझते है वहीं इनके किसी भी मंदिर में फंड की कमी नहीं होती है । यह दिन दुनी रात चौगुनी गति से विस्तार करते रहते हैं।

हिन्दू धर्म को नुकसान पहुँचाने का यह तीसरा और अंतिम प्रयास है  । पहले हमलावर मुस्लिमों द्वारा , बाद में अँगरेजों के द्वारा , और अब साँईं षडयंत्रकारियों के द्वारा। अँगरेजों ने हमारी शिक्षा पद्धति को अपने मुताबिक बना कर अपनी योजना को सफल बनाया जिसमें मैकाले का योगदान अविस्मरणीय है। 

वेद की गलत व्याख्या करके दुनिया को भरमाने का काम मैक्समुलर ने किया। इन दोनों की वजह से हम अपने मूल से अलग होकर एक ऐसी पीढ़ी बना चुके हैं जिसे ये नहीं पता कि हम जा किस दिशा में रहे हैं?अब यही भटकी हुई पीढ़ी इन नए षडयंत्रकारियों की शिकार हो रही है।

आज भोले भाले हिंदुओं पर यह दबाव बनाया जा रहा है कि वे साँईं (असल मे चाँद मियाँ) को भगवान का दर्जा देवें । हम व्यक्तिगत तौर पर पूजा की पद्धत्ति पर सहमत-असहमत हो सकते हैं परन्तु समग्र हिन्दू समाज के खिलाफ हो रहे आक्रमण के खिलाफ हमे एक होना ही होगा। 

साँईं बाबा के नाम से कैसे अतिक्रमण होता है ,इसको भी जरा समझें । हिन्दू जब कीर्तन करते हैं तो गाते है  हरे राम ,हरे राम ,राम-राम,हरे-हरे ...हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे...... । अब इसमें साईं भक्तों को  कोई लय नजर नहीं आती है। परन्तु जब साँईं गीत बजता है" साँईं राम साँईं श्याम साँईं भगवान शिर्डी के साँईं हैं सबसे महान ....."। इसमें उन सबको लय नजर आ जाती है। इसे उन हिन्दू से भक्तों द्वारा अपने फोन का रिंगटोन बनाया जाता हैं। आप विशेष तौर पर आखिरी शब्दों पर गौर करें की 
"शिर्डी के साँईं हैं सबसे महान" 
मने साईं बाबा के उपर राम या श्याम कोई नहीं ।

इतनी जल्दी यानी महज 30 से 40 सालों में ये कैसे महान बन गए भई ? पटेल, बोस,टैगोर , सावरकर ,भगतसिंह, आजाद आदि किसी के मुँह से , किसी के लेखों में साँईं का नाम आया है ?बताए कोई ? यह भी बताए कोई कि प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, दिनकर आदि ने कभी भी साँईं का जिक्र किया ? जरा सोचें और अपनी मूर्खता पर हँसें । अब देखें हिंदुओं के  इष्टों का हाल क्या बना दिया है इन्होंने? कई जगह साँईं की प्रतिमा के पैरों के नीचे बजरंग बली की प्रतिमा रखी जा रही है । वे सेवक की भाँति खड़े हैं । सभी भगवान जैसे राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि साँईं के आगे गौण हो गए हैं। क्या साईं भक्तों का अपने भगवानों पर से विश्वास उठ चुका है ? क्या वे हिंदुओं की मनोकामना पूरी करने में अक्षम हो गए हैं ? 

ये तो हद हो गई ! गुहार लगानी पड़ रही है उस हिन्दू धर्म को जो आदि काल से है । और गुहार भी किससे लगा रहे है?उस संस्थान से जिसे मात्र पचास वर्ष भी नहीं हुए गठित हुए ।

यह संस्थान आने वाले समय मे भविष्य की पीढ़ियों को राम-कृष्ण-शिव की याद को हमेशा के लिए विस्मृत करवा कर ही छोड़ेगा । मामला लव जेहाद से भी आगे का है । इसे समझे। हमारे अपने भाई व बहन जो साईं बाबा के चंगुल में फंसे है उनका विवेक जगाएं । उन्हें इन बातों पर सोचने पर मजबूर करें । यह जागृत होने का समय है । रक्षा करने का समय है । हिन्दू धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो के उदघोष का समय है ।

Corona vs other fatal diseases

The number of deaths in the world in the last 3 months of 2020

      3,14,687 : Corona virus

      3,69,602 : Common cold

      3,40,584 : Malaria

     3,53,696 : suicide

     3,93,479 : road accidents

     2,40,950 : HIV 

     5,58,471 : alcohol

     8,16,498 : smoking

  11,67,714: Cancer

 Then do you think Corona is dangerous? 

 Or

is the purpose of the media campaign to settle the trade war between China and America 

or

to reduce financial markets to prepare the stage of financial markets for mergers and acquisitions 

or 

to sell US Treasury bonds to cover the fiscal deficit in them

Or

Is it a Panic created by Pharma companies to sell their products like sanitizer, masks, medicine etc.

Do not Panic & don't kill yourself with unecessary fear. This posting is to balance your newsfeed from posts that caused fear and panic. 

 33,38,724 People are sick with Coronavirus at the moment, of which 32,00,000 are abroad. This means that if you are not in or haven't recently visited any foreign country, this should eliminate 95% of your concern.

If you do contact Coronavirus, this still is not a cause for panic because:

81% of the Cases are MILD

14% of the Cases are MODERATE

Only 5% of the Cases are CRITICAL

Which means that even if you do get the virus, you are most likely to recover from it.

Some have said, “but this is worse than SARS and SWINEFLU!”  SARS had a fatality rate of 10%, Swine flu 28% while COVID-19 has a fatality rate of 2%

Moreover, looking at the ages of those who are dying of this virus, the death rate for the people UNDER 55 years of age is only 0.4%

This means that: if you are under 55 years of age and don't live out of India - you are more likely to win the lottery (which has a 1 in 45,000,000 chance)
Let's take one day ie 1 May as an example when Covid 19 took lives of 6406 in the world.
On the same day:

26,283 people died of Cancer

24,641 people died of Heart Disease

4,300 people died of Diabetes

Suicide took 28 times more lives than the virus did.

Mosquitoes kill 2,740 people every day, HUMANS kill 1,300 fellow humans every day, and Snakes kill 137 people every day. (Sharks kill 2 people a year)

SO DO THE DAILY THINGS TO SUPPORT YOUR IMMUNE SYSTEM , PROPER HYGIENE AND DO NOT LIVE  IN FEAR.

Join to Spread *Hope* instead of Fear. 

Monday, 25 May 2020

Purusarth

हिन्दू धर्म में पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है । पुरुषार्थ = पुरुष+अर्थ = अर्थात मानव को 'क्या' प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रायः मनुष्य के लिये वेदों में चार पुरुषार्थों का नाम लिया गया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसलिए इन्हें 'पुरुषार्थचतुष्टय' भी कहते हैं।

मित्रों, अगर कोई व्यक्ति परिश्रमी एवम पुरुषार्थी तो है, किन्तु उसमें आत्मविश्वास तथा आत्मनिर्भरता की भावना का अभाव है, तो भी उसका पुरुषार्थ व्यर्थ चला जाता है, व्यक्ति अपने आपको दीन-हीन नहीं बल्कि शक्तिशाली समझें, वह महसूस तथा विश्वास करें कि बीज रूप में मेरे भीतर सारी शक्तियाँ विद्यमान है।

हमें अहसास हो कि मैं सब कुछ कर सकता हूँ, जो अन्य सफल व्यक्तियों ने किया है, विश्वास करो कि हम संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है, वास्तव में सबके भीतर परमात्मा ने एक जैसी शक्ति दी है, आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने आप पर विश्वास करता है और सफलता के मार्ग में आने वाली कठिनाईयों को पार कर लेता है।

लेकिन परावलम्बी व्यक्ति आत्मविश्वास के अभाव में हर कदम पर झिझकता है, सज्जनों! सफलता के मार्ग में अवरोध तो आते ही हैं, हमारे आत्मविश्वास पूर्वक डटे रहने से हमारे अन्य सहयोगी भी साथ आ जाते हैं, और सहयोग मिलने लगता है, जो व्यक्ति लक्ष्य की प्राप्ती तक बिना रूके निरन्तर चलते रहते हैं, चाहे कछुआ की भांति धीरे-धीरे ही क्यों न हो, सफल अवश्य हो जाते हैं।

जिन्हें अपने ध्येय, लक्ष्य के प्रति लगन है, निष्ठा है, उसके मार्ग में ऐसा कौनसा अवरोध हो सकता है? जो उसे रोक सके, लेकिन आज का सोया हुआ कल बदल गया, या चार दिन परिश्रम करने के बाद पानी के बुलबुले की भांति लक्ष्य देने के बाद कुछ दिन लक्ष्य के प्रति समर्पण दिखाने के बाद फिर आराम करने लग गये, तो खरगोश और कछुए की कहानी की भांति, असफलता ही हाथ लगेगी। 

लक्ष्य के प्रति समर्पित व्यक्ति का सूत्र होता है, कोई छुट्टी नहीं, किसी से कोई अपेक्षा नहीं, कोई भेदभाव नहीं, किसी से कोई शिकायत नहीं, ऐसे व्यक्तियों को जमाना याद रखता है, जैसे वन-वन भटककर और घास की रोटी तक खाने वाले हमारे महापराक्रमी वीर महाराणा प्रताप ने कभी हिम्मत नहीं हारी और अन्त तक निरन्तर चलते रहे और इतिहास बन गयें, अमर हो गयें।

नकारात्मक सोच अर्थात् निराशा, भय, सन्देह, उद्विगनता, अविश्वास के भाव, घुटन भरी सोच, याद रखिये चिन्ता और चिता एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं, जो व्यक्ति की जीवनी शक्ति एवं कार्यक्षमता को घटाते-घटाते समाप्त कर देती है, मेरे भाई-बहनों आप अतीत या भविष्य को लेकर चिन्तित न हों, बल्कि स्वस्थ चिन्तन करें।

चिन्ता में व्यक्ति अतीत की असफलताओं, गलतियों, अपमान, दु:ख आदि अप्रिय प्रसंगों को याद करते हुयें केवल यही सोचता है कि एसा क्यों हुआ? कैसे हो गया? आगे अब क्या होगा? कैसे होगा? चिन्ता से वयक्ति केवल परेशान होता है, उसकी शारीरिक मानसिक और आत्मिक स्थिति अत्यन्त दील दुर्बल हो जाती है, जो बीत गयीं सो बात गयीं।

तकदीर का शिकवा कौन करे, जो तीर कमान से निकल गया, उस तीर का पीछा कौन करे, स्वस्थ चिन्तन से समस्या का हल निकलता है, मस्तिष्क की ऊर्जा सक्रिय दिशा में तेजी से काम करती है, चिन्तामुक्त होने का रामबाण उपाय है व्यस्त रहें, और हमारे बुजुर्गों की जो कहावत है- "व्यस्त रहें, मस्त रहें उस कहावत को चरितार्थ करें। 

अचित्य चिन्तन से मुक्त होकर श्रेष्ठ विचारों से ऊँचाई की पराकाष्ठा पर पहुँचा जा सकता है, याद रखिये की मानसिक सन्तुलन प्रसन्नता के अधीन रहा करता है, सफलता पाने के लिए प्रसन्नता की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी शरीर यात्रा के लिये जीवन की, अप्रसन्न व्यक्ति एक प्रकार से निर्जीव सा ही होता है, उसे विषाद और निराशा का क्षय रोग लग जाता है। 

इस प्रकार के नम्र स्वभाव वाला व्यक्ति बनें, नम्रता से सफलता के महान पथ पर चलने में सुगमता होती है, अत: प्रसन्न रहने की आदत डालें, मुस्कुरायें, अपना सुख तथा दूसरों का दु:ख आपस में बाँटे, मुस्कुराने से स्वभाव या आसपास का वातावरण महकने लगता है, आशा का और उमंग का संचार होता है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, इसलिये प्रसन्नता से किया गया कार्य सम्पूर्णता की गारंटी माना गया है।

दोस्तों! प्रसन्न रहने के दो ही उपाय हैं- आवश्यकतायें कम करें तथा परिस्थितियों से तालमेल बिठायें, आप ऐसे सफल व्यक्ति या महामुरुष को अपना आदर्श बनायें जिन्होंने आदर्शों पर चलकर एवम् कठिनाईयों से लडक़र जीवन में सफलता पाई हो,  इतिहास में ऐसे गौरवशाली चरित्र के बहुत उदाहरण हैं, उन्हें अपना आदर्श बनायें, ऐसे महापुरुष हमारे जीवन के लिए प्रकाश स्तम्भ हैं।

ऐसे महापुरुषों से हमें समस्याओं, अभावों, प्रतिकुलताओं में लडऩे का हौसला बढ़ता है, सत्प्रेरणा मिलती है, न कि किसी फिल्मी एक्टर, खिलाड़ी, विश्व सुन्दरी या गलत साधनों व तरीकों से मंजिल पर पहुँचने वाले नेता, अभिनेता या धनपतियों को अपना आदर्श बनायें, हमारे देश के महान् विचारक, श्रेष्ठ कर्मयोगी, श्रद्धेय श्री स्वामी विवेकानन्दजी ने युवावस्था में ही भारतीय संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित किया। 

वातावरण एवम सत्संग का प्रभाव भी व्यक्ति पर पड़ता है, कुसंग या बुरी संगति में अच्छा व्यक्ति भी निकम्मा, अधर्मी, जुल्मी, नास्तिक या डरपोक बन सकता है, जबकि अच्छी संगति में सामान्य स्तर का मनुष्य भी श्रेष्ठ आचरण करने पर बाध्य हो जाता है, श्रेष्ठ संगती से मनुष्य की गति भी श्रेष्ठ दिशा की ओर हो जाती है, अत: सावधान रहें, याद रखिये, गंदे नाले में गंगा जल की सात्विकता नहीं रह जाती।

भाई-बहनों समझदारी इसी में है कि दुव्र्यसनी, हिंसक, व्यभिचारी, चोर प्रकृति, अशुद्ध भाषण करने वाले, कपटी, आलसी, प्रमादी, धन व समय का अपव्यय व दुरुपयोग करने वाले मित्रों की संगति न करें, सुदामाजी ने श्री कृष्ण से मित्रता की वे निहाल हो गये, तथा दुर्योधन ने शकुनि से मित्रता की थी परिणामस्वरुप सारे कौरव वंश का नाश हो गया, महापुरुषों की संगती श्रेष्ठ संगति है और संगति करने का माध्यम है, स्वाध्याय, श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ना।

सद्ग्रन्थों के अध्ययन से तत्काल प्रकाश, उल्लास और मार्गदर्शन मिलता है और विचारों में सकारात्मकता आती है, क्रोध और अहंकार करने वाले का समाज में कोई मित्र नहीं होता, पग-पग पर उसके विरोधी, दुश्मन, और आलोचक पैदा हो जाते हैं, क्रोध से अविवेक और अविवेक से उत्तेजना पैदा होती  है, सम्पूर्ण मस्तिष्क अज्ञानता से भर जाता है और अज्ञान से क्रोधी व्यक्ति का पतन और अन्तत: सर्वनाश हो जाता है।

याद रखिये दिनभर में एक व्यक्ति जितना भोजन करता है उसकी सारी ऊर्जा एक बार के क्रोध से नष्ट हो जाती है, अहंकारी व्यक्ति अपने ही मद में चूर रहता है उसके लिए संसार में सीखने के सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं, उसकी उन्नति असम्भव है, हमेशा अपने व्यवहार को सोम्य बनाकर रखें, विनम्रतापूर्वक विद्यार्थी भाव रखने वाले के सामने सारी प्रकृति और परिवार समाज सभी अपना रहस्य व सहयोग के द्वारा खोल देता है। 

विनम्रता व शालीनता से माता-पिता, मित्र, गुरुजन सभी अपना सद्भाव भरा सहयोग और आशीर्वाद से हमारी झाोली भर देते हैं,  जो सफलता का बहुत बड़ा कारण है, जो जीवन से प्यार करते हों वे आलस्य में समय न गंवायें, समय ही जीवन है, हम समय की कीमत चुकाकर ही सफल विद्यार्थी, कलाकार, संगीतकार, धनपति, आविष्कारक, किसी विषय का विशेषज्ञ हो सकते हैं। 

जो समय को गप्पबाजी, आवारागर्दी आलस्य में गंवाता है वह सब कुछ गंवा देता है, जो समय को काटता है, टाईम पास करता है, टाईम उसे पास कर देता है, बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता, समय को संग्रह नहीं कर सकते, एक समय विशेष के साथ जो सम्भावनायें जुड़ी रहती है वह उसके साथ ही चली जाती है, इसलिये समय का नुकसान सबसे बड़ा नुकसान है, अत: समय का संयम बरतें, आज का काम कल पर न टालें।

काल करें सो आज कर, आज करें सो अब।
पल में प्रलय होयगा पगला करेगा कब।।

अपना प्रत्येक कार्य समय पर पूरा करें, रात्रि में शयन से पहले अपने समय की समीक्षा करें, सफलता की सिद्धि मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो व्यक्ति अपने इस अधिकार की अपेक्षा करके जैसे तैसी जी लेने में ही सन्तोष मान लेते हैं, वे इस महा मूल्यवान मानव जीवन का अवमूल्यन कर एक ऐसे सुअवसर को खो देते हैं, जिसका दोबारा मिल सकना संदिग्ध है। 

जय महादेव! 
ओऊम् नम: शिवाय्

Sunday, 24 May 2020

Gandhi and Godse

सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने पर प्रकाशित किया गया 
60 साल तक भारत में प्रतिबंधित रहा नाथूराम गोडसे 
का अंतिम भाषण -
                    #मैंने_गांधी_को_क्यों_मारा !

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी लेकिन नाथूराम गोड़से घटना स्थल से फरार नही हुए बल्कि उसने आत्मसमर्पण कर दिया 
नाथूराम गोड़से समेत 17 देशभक्तों पर गांधी की हत्या का मुकदमा चलाया गया इस मुकदमे की सुनवाई के दरम्यान #न्यायमूर्ति_खोसला से नाथूराम जी ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर जनता को सुनाने की अनुमति माँगी थी जिसे न्यायमूर्ति ने स्वीकार कर लिया था पर यह कोर्ट परिसर तक ही सिमित रह गयी क्योकि सरकार ने नाथूराम के इस वक्तव्य पर प्रतिबन्ध लगा दिया था लेकिन नाथूराम के छोटे भाई और गांधी की हत्या के सह-अभियोगी गोपाल गोड़से ने 60 साल की लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट में विजय प्राप्त की और नाथूराम का वक्तव्य प्रकाशित किया गया l

                     *मैंने गांधी को क्यों मारा*

नाथूराम गोड़से ने गांधी हत्या के पक्ष में अपनी 
150 दलीलें न्यायलय के समक्ष प्रस्तुति की
नाथूराम गोड़से के वक्तव्य के कुछ मुख्य अंश....
नाथूराम जी का विचार था कि गांधी की अहिंसा हिन्दुओं 
को कायर बना देगी कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी को मुसलमानों ने निर्दयता से मार दिया था महात्मा गांधी सभी हिन्दुओं से गणेश शंकर विद्यार्थी की तरह अहिंसा के मार्ग पर चलकर बलिदान करने की बात करते थे नाथूराम गोड़से को भय था गांधी की ये अहिंसा वाली नीति हिन्दुओं को 
कमजोर बना देगी और वो अपना अधिकार कभी 
प्राप्त नहीं कर पायेंगे...
1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोलीकांड 
के बाद से पुरे देश में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ 
आक्रोश उफ़ान पे था...
भारतीय जनता इस नरसंहार के #खलनायक_जनरल_डायर 
पर अभियोग चलाने की मंशा लेकर गांधी के पास गयी 
लेकिन गांधी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन 
देने से साफ़ मना कर दिया 
महात्मा गांधी ने खिलाफ़त आन्दोलन का समर्थन करके भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया  महात्मा गांधी खुद को मुसलमानों का हितैषी की तरह पेश करते थे वो #केरल_के_मोपला_मुसलमानों द्वारा वहाँ के 
1500 हिन्दूओं को मारने और 2000 से अधिक हिन्दुओं 
को मुसलमान बनाये जाने की घटना का विरोध 
तक नहीं कर सके 
कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में #नेताजी_सुभाष_चन्द्रबोस 
को बहुमत से काँग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गांधी ने #अपने_प्रिय_सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे गांधी ने सुभाष चन्द्र बोस से जोर जबरदस्ती करके इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया...
23 मार्च 1931 को भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी पूरा देश इन वीर बालकों की फांसी को 
टालने के लिए महात्मा गांधी से प्रार्थना कर रहा था लेकिन गांधी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए देशवासियों की इस उचित माँग को अस्वीकार कर दिया 
गांधी #कश्मीर_के_हिन्दू_राजा_हरि_सिंह से कहा कि 
#कश्मीर_मुस्लिम_बहुल_क्षेत्र_है_अत:वहां का शासक 
कोई मुसलमान होना चाहिए अतएव राजा हरिसिंह को 
शासन छोड़ कर काशी जाकर प्रायश्चित करने जबकि  हैदराबाद के निज़ाम के शासन का गांधी जी ने समर्थन किया था जबकि हैदराबाद हिन्दू बहुल क्षेत्र था गांधी जी की नीतियाँ 
धर्म के साथ बदलती रहती थी उनकी मृत्यु के पश्चात 
सरदार पटेल ने सशक्त बलों के सहयोग से हैदराबाद को 
भारत में मिलाने का कार्य किया गांधी के रहते ऐसा करना संभव नहीं होता 
पाकिस्तान में हो रहे भीषण रक्तपात से किसी तरह से अपनी जान बचाकर भारत आने वाले विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली मुसलमानों ने मस्जिद में रहने वाले हिन्दुओं का विरोध किया जिसके आगे गांधी नतमस्तक हो गये और गांधी ने उन विस्थापित हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया 
महात्मा गांधी ने दिल्ली स्थित मंदिर में अपनी प्रार्थना सभा 
के दौरान नमाज पढ़ी जिसका मंदिर के पुजारी से लेकर 
तमाम हिन्दुओं ने विरोध किया लेकिन गांधी ने इस विरोध को दरकिनार कर दिया लेकिन महात्मा गांधी एक बार भी किसी मस्जिद में जाकर गीता का पाठ नहीं कर सके 
लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से विजय 
प्राप्त हुयी किन्तु गान्धी अपनी जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया गांधी अपनी मांग 
को मनवाने के लिए अनशन-धरना-रूठना किसी से बात 
न करने जैसी युक्तियों को अपनाकर अपना काम 
निकलवाने में माहिर थे इसके लिए वो नीति-अनीति का लेशमात्र विचार भी नहीं करते थे
14 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था लेकिन गांधी ने वहाँ पहुँच कर 
प्रस्ताव का समर्थन करवाया यह भी तब जबकि गांधी  
ने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश 
पर होगा न सिर्फ देश का विभाजन हुआ बल्कि लाखों 
निर्दोष लोगों का कत्लेआम भी हुआ लेकिन गांधी 
ने कुछ नहीं किया....
धर्म-निरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के जन्मदाता महात्मा गाँधी ही थे जब मुसलमानों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का विरोध किया तो महात्मा गांधी ने सहर्ष ही इसे स्वीकार कर लिया और हिंदी की जगह हिन्दुस्तानी (हिंदी+उर्दू की खिचड़ी) को बढ़ावा देने लगे  बादशाह राम और बेगम सीता जैसे शब्दों का 
चलन शुरू हुआ...
कुछ एक मुसलमान द्वारा वंदेमातरम् गाने का विरोध करने 
पर महात्मा गांधी झुक गये और इस पावन गीत को भारत 
का राष्ट्र गान नहीं बनने दिया 
गांधी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी महाराणा प्रताप व 
गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा वही दूसरी 
ओर गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को क़ायदे-आजम 
कहकर पुकारते था
कांग्रेस ने 1931 में स्वतंत्र भारत के राष्ट्र ध्वज बनाने के 
लिए एक समिति का गठन किया था इस समिति ने 
सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र को भारत का 
राष्ट्र ध्वज के डिजाइन को मान्यता दी किन्तु गांधी जी 
की जिद के कारण उसे बदल कर तिरंगा कर दिया गया 
जब सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में सोमनाथ 
मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया तब गांधी जी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य 
भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव 
को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला 
भारत को स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान को एक समझौते के तहत 75 करोड़ रूपये देने थे भारत ने 20 करोड़ रूपये 
दे भी दिए थे लेकिन इसी बीच 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण से क्षुब्ध होकर 55 करोड़ की 
राशि न देने का निर्णय लिया | जिसका महात्मा गांधी ने 
विरोध किया और आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 55 करोड़ की राशि भारत ने पाकिस्तान 
को दे दी महात्मा गांधी भारत के नहीं अपितु पाकिस्तान 
के राष्ट्रपिता थे जो हर कदम पर पाकिस्तान के पक्ष में 
खड़े रहे फिर चाहे पाकिस्तान की मांग जायज हो या 
नाजायज गांधी ने कदाचित इसकी परवाह नहीं की 
उपरोक्त घटनाओं को देशविरोधी मानते हुए नाथूराम 
गोड़से जी ने महात्मा गांधी की हत्या को न्यायोचित 
ठहराने का प्रयास किया...
नाथूराम ने न्यायालय में स्वीकार किया कि माहात्मा गांधी बहुत बड़े देशभक्त थे उन्होंने निस्वार्थ भाव से देश सेवा की  
मैं उनका बहुत आदर करता हूँ लेकिन किसी भी देशभक्त 
को देश के टुकड़े करने के एक समप्रदाय के साथ पक्षपात करने की अनुमति नहीं दे सकता हूँ गांधी की हत्या के 
सिवा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं था...!!
#नाथूराम_गोड़सेजी द्वारा अदालत में 
दिए बयान के मुख्य अंश...
मैने गांधी को नहीं मारा
मैने गांधी का वध किया है..
वो मेरे दुश्मन नहीं थे परन्तु उनके निर्णय राष्ट्र के 
लिए घातक साबित हो रहे थे...
जब व्यक्ति के पास कोई रास्ता न बचे तब वह मज़बूरी 
में सही कार्य के लिए गलत रास्ता अपनाता है...
मुस्लिम लीग और पाकिस्तान निर्माण की गलत निति 
के प्रति गांधी की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने ही मुझे 
मजबूर किया...
पाकिस्तान को 55 करोड़ का भुगतान करने की 
गैरवाजिब मांग को लेकर गांधी अनशन पर बैठे..
बटवारे में पाकिस्तान से आ रहे हिन्दुओ की आपबीती 
और दुर्दशा ने मुझे हिला के रख दिया था...
अखंड हिन्दू राष्ट्र गांधी के कारण मुस्लिम लीग 
के आगे घुटने टेक रहा था...
बेटो के सामने माँ का खंडित होकर टुकड़ो में बटना 
विभाजित होना असहनीय था...
अपनी ही धरती पर हम परदेशी बन गए थे..
मुस्लिम लीग की सारी गलत मांगो को 
गांधी मानते जा रहे थे..
मैने ये निर्णय किया कि भारत माँ को अब और 
विखंडित और दयनीय स्थिति में नहीं होने देना है 
तो मुझे गांधी को मारना ही होगा
और मैने इसलिए गांधी को मारा...!!
मुझे पता है इसके लिए मुझे फाँसी ही होगी 
और मैं इसके लिए भी तैयार हूं...
और हां यदि मातृभूमि की रक्षा करना अपराध हे 
तो मै यह अपराध बार बार करूँगा हर बार करूँगा ...
और जब तक सिन्ध नदी पुनः अखंड हिन्द में न बहने 
लगे तब तक मेरी अस्थियो का विसर्जन नहीं करना...!!
मुझे  फाँसी देते वक्त मेरे एक हाथ में केसरिया ध्वज 
और दूसरे हाथ में #अखंड_भारत का नक्शा हो...
मै फाँसी चढ़ते वक्त अखंड भारत की जय 
जयकार बोलना चाहूँगा...!!

Kalidasa

कालिदास बोले :- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.
स्त्री बोली :-  बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो।
मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।
कालीदास ने कहा :- मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें।
स्त्री बोली :- तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।
कालिदास ने कहा :- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।
स्त्री बोली :- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं।
पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?
.
(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)
कालिदास बोले :- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।
स्त्री ने कहा :- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?
(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)
कालिदास बोले :- मैं हठी हूँ ।
.
स्त्री बोली :- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ?
(पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)
कालिदास ने कहा :- फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।
.
स्त्री ने कहा :- नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो।
मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।
(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)
वृद्धा ने कहा :- उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)
माता ने कहा :- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।
.
कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।
शिक्षा :-
विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।
दो चीजों को कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए.....
अन्न के कण को
"और"
आनंद के क्षण को
🙏💐

Sunday, 17 May 2020

Economic package

Recently economic package of 20 lacs crore were announced. We were expecting charity/donation ....Hence many people disappointed that they did not get any cash.
Govt collects taxes for high quality governance. I feel that aprogressive government should never gives money to citizens. Instead make them self sufficient to make money on their own.
Money has been given in form of loan, subsidy, policy reforms which will directly indirectly benefit all the people.
What is required is that business flourishes and jobs are created.
Further It depends on people to work fruitfully and provide world class goods and service.
More the quality work services and it's supply ...More is the prosperity for the society.

In economics everything is circular and not linear
Every economic action or policy affects each other. Intent of the policy maker and their will decides how the society is shaped.

Demand side will improve once people start working and get money in return for their goods or service
Govt has started giving work. Encouraging private sector also to expand
FDI provision also relaxed to bring foreign capital and expertise

COVID is extraordinary times. 2 months of lockdown....People were given free food in hunger shelters...Free rations distributed...Needy people..Cash credited in their accounts.....
I feel the economic package is more about reviving the economy so that prosperity can return for all

Giving cash is a dead expense
Giving loan means using the same money over and over again
Also it encourages people to perform 
If people perform then only the quality of life of a society can improve

Demand will be generated with loans....People will take loan money and buy product and services for providing further product t and services

It's circular and keep on rotating...The loan money will keep on circulating and keep on adding to GDP and prosperity

The faster it moves the faster will be growth

We should be careful about environment also.....In our greed we should not forget nature

We should maintain the balance






prem ki kamna

°°°°°जगद्गुरु _ आदेश °°°°°°
_श्रीकृष्ण का माधुर्य भाव युक्त निष्काम प्रेम प्राप्त कर, उनकी नित्य सेवा ही तुम्हारा लक्ष्य है ।
_वह दिव्य निष्काम प्रेम, गुरु कृपा द्वारा अन्तः करण शुद्धि होने पर 
ही प्राप्त होगा ।
_वह अन्तः करण शुद्धि,गुरु द्वारा  निर्दिष्ट साधना द्वारा ही संभव है ।
_साधना_श्री राधा कृष्ण का रुपध्यान करते हुये ( स्वेच्छा से  बनाये हुये रूप में दिव्य भावना रखना है ) रोकर नाम, गुण, लीलादि का संकिर्तन करो ।
_सदा श्रीकृष्ण को अपने साथ ही मानो ।
_मोक्ष पर्यन्त की कामना छोड़कर, केवल दिव्य शुद्ध प्रेम की कामना से ही प्रेम करो ।
_" वे ही मेरे हैं," इस भावना को निरंतर दृढ करो ।
एवं श्याम मिलन की परमव्याकुलता पैदा करो ।
_ परदोष दर्शनादि कुसंगों से बचो ।
मानव देह का प्रत्येक क्षण अमूल्य मानो ।
_________मैं सदा तुम्हारा सहायक हूँ ।__तुम्हारा कृपालु.. !

Thursday, 14 May 2020

national language

Every one should learn their own country's national (official) language. It's what unite us all

1 Observations
No need of national language so far India is concern

Best common thread will be best education to all citizens of India along with ethics, moral and value.
Language is just communication medium.

Idea is good....Is every state ready...

We have not given importance to Hindi.  Last many years we are only doing the Hindi workshop but never tried to improve the Hindi language.  We need to provide Engineering, MBA, MBBS & CA books in Hindi and stop the use of the English language then only Hindi will be popular. Hindi films and TV serials have done a good job.  We all Hindi speaking people are mainly responsible. 

Take on the obsevations
It's a common thread like in mala or haar

Education is for individual and it has to be communicated to bring practical use out it
Proper communication removes confusion and hatred
Yes...for that best education is required to understand right morning of communication..
Education is panacea

English can run parallel
No use wasting national energy on something which has become part of our system
But Hindi is the binding factor and should be respected too
We watch Hindi movies listen to hindi songs....

Observation 2
Hindi is a parallel running because every Indian like to see Hindi Movies but talk in English or Regional language. In our hypocrite society, even many Hindi speaking people talk to their kids in English only. thanks for your view dear. 

Take on observation
Let's accept the society as it is....After all its ours....Jaisa bhi hai acha hai....No one is perfect....We have to respect diverse thought processess...Learn and further spread the knowledge

Observation 3
छेत्रिय भाषा ही देश की धड़कन है

Reply
But we also need one common language as a nation

Observation 4
भारत शुरू से एक सर्वधर्मीय राष्ट्र बना औ र किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा को राष्ट्रभाषा नही अपणया.

हमारे साथ पाकिस्तान का जन्म ह्या, धर्म के आधार पर आऊर उर्दू राष्ट्रभाषा के साथ, जो पुर्व पाकिस्तान के बांगला भाषिक लोगो पर थोपी गायी.  नातिजा क्या ह्यूए आपने देखा है

Reply
However I feel Hindi is voice of nation and doest not represent  a particular community or religion

We all belong to different caste....At home we all speak in our local language with parents and close relatives
But we need a national language which can bind this diverse and populous country

We all belong to different caste....At home we all speak in our local language with parents and close relatives
But we need a national language which can bind this diverse and populous country

So that the entire country can understand each other
If every one speak differently how they will understand each other

Imagine father mother children all speaking different language.....Staying under one roof

Observation 5
 If you are going to any other region, learn language of that region, that's all

Reply
If I want to communicate with entire nation at one time....?

Should I repeat myself in all different language to communicate with brothers and sisters of our country

Observation 6
 Current rules are sufficient, no need of national language

Reply
No need for any change of rules....People just need to know it... and respect it

Observation 7
 I love listening various Indian lat, and want to learn at least one Indian language other than my mother tongue and Hindi

Reply
I also speak 4 langauge and keen to learn more

Currently learning Assamese .....A very beautiful language

During my last posting I learnt Odiya....A very sweet language

Observation 8
Vikash Agarwal Agreed. I m in Chennai, so I know how much it important to have a common language accross country....

Try Sanskrit..  why hindi?  because it came after Mughals? 

Vikash Agarwal no. We can't hv a single language in this multi language country.

Sib Sankar Datta here lies the problem. The moment hindi speaking people get a chance they propagate thier language without caring for richness of other indian languages. They will not learn English too. They spread this hate campaign only bcoz they r weak in English. 

Reply

Sir Hindi does not belong to a particular community or religion....It's the language of Bharat...Our country
I speak marwari at home....Spoke bengali odiya and now Assamese at office
Watch Hindi English Bengali movies and enjoy listening to hindi bangla rajasthani songs
But we need one common language for the nation....Other wise it will be like people in family speaking different language....Father speaking one Mother another and children another....If there is no single common language...How will they communicate and stand as a family....Same for the nation too

Observation 9
Just a bit of perspective.you're post just reminded me of this saying " without one state language, no nation can remain tied up solidly together and function.". Do you agree?

Reply

No denying that.....State language should be there .....Even some states have multiple language which differs on village levels....One hill different from another hills....We have several adiwasi language....Hundreds of them....People living in forest......They should all co exist...
But in addition to local languages we need one national language....

Observation 10

the statement i made was made by Mohd Ali Jinnah at dacca, in 1950 - 51. One language ended up breaking the country. 

That was due to imposition of one language and undermine other languages
Other languages were considered inferior and by force one language was being imposed. People were forced to leave their language
Here in Bharat we are free to speak as many as language we want
What we want is a single language for common communication with all Bharatwasis

Monday, 11 May 2020

Chaar Dham

*एक बहुत बड़े फकीर हुये हैं- हजरत जुनैदो, बड़े प्रख्यात। उनकी एक कहानी है, बड़ी सुन्दर। एक कोई साहब थे, हज करके लौटे थे। तो हाजी लोग जरा समझते हैं कि हम भी कुछ हैं, जैसे चारों धाम करके आप लोगों में से कोई आवे, तो सबसे बातें करता है, हम चारों धाम गये थे। चारों धाम कर आये। जबरदस्ती बिना पूछे भी बोलेगा (हँसी)। तो उस हाजी से हज़रत जुनैदो ने पूछा कि तुम जब काबे की ओर चले, अपने घर से, मक्का मदीना की ओर, तो तुम खुदा की ओर बढ़े- ऐसा तुमको महसूस हुआ कि नहीं? नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। तो फिर तुम काबे की ओर गये ही नहीं, तुमको धोखा है। कई पड़ाव होते हैं, मक्का मदीना पहुँचने में उनके नियम हैं, कायदे कानून हैं। यहाँ पड़ाव पड़ा, फिर उसके बाद यहाँ पड़ाव पड़ा, फिर उसके बाद यहाँ पड़ाव पड़ा। कई पड़ाव के बाद फिर काबा पहुँचते हैं। तो जितने पड़ाव पड़े, उन पड़ावों पर तुमने यह रियलाइज़ किया, यह महसूस किया कि अब मैं खुदा के पास आ गया हूँ, अब मैं बहुत आगे बढ़ गया हूँ। अरे नहीं, मैं तो वैसे रहा नार्मल। तो तुमने पड़ाव किया ही नहीं। फिर? अच्छा, तुमने अहराम पहना? अहराम कहते हैं, ये जो सिले-सिलाये कपड़े आप लोग पहनते हैं, इसको निकाल करके बिना सिले कपड़े पहनते हैं, जो हज करने जाते हैं, मक्का मदीना में। तो वह बिना सिले कपड़े को जो ओढ़ते हैं, पहनते हैं, तो उसको अहराम कहते हैं। तो तुमने सिले-सिलाये कपड़े छोड़े और बिना सिले ओढ़े, तो उस समय तुमने बुराइयां छोड़ दी सब, क्या? नहीं, बुराई-वुराई तो नहीं छोड़ी। तुमने अहराम पहना ही नहीं। फिर वहाँ एक पहाड़ी है इरफ़ान नाम की। इरफ़ान नाम की पहाड़ी पर खड़ा हो करके आदमी और आँख बंद करके खुदा की इबादत करता है। भगवान् को नमस्कार करता है। तो जब तुम इरफ़ान की पहाड़ी पर खड़े हुये थे, तो उस समय क्या तुमने महसूस किया कि अब मैं खुदा के यहाँ पहुँच गया हूँ, अब दुनिया में मेरा कुछ भी नहीं है। नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। तो तुम इरफ़ान की पहाड़ी पर खड़े ही नहीं हुये, इसका मतलब। वहाँ दो पहाड़ियाँ हैं सफा और मरवा। तो सफा और मरवा पहाड़ियों पर तुम दौड़े होंगे? यह सब बता रहा हूँ, कायदा है जो हज करने जाता है, सबको करना पड़ता है। तो सफा और मरवा पहाड़ियों में जब तुम दौड़े, तो सफा माने पाकी और मरवा माने मुरव्वत, दया, ये तुम्हारे अन्दर आई। तो ये तो कोई खास बात नहीं हुई। तो तुम उस पहाड़ी पर दौड़े ही नहीं, फिर। वहाँ एक जगह कुर्बानी करनी होती है, तुमने ख्वाहिशों की कुर्बानी की, इच्छाओं की कुर्बानी की। इच्छायें समाप्त हुईं, कुर्बानी करने के बाद? नहीं, कोई इच्छायें समाप्त नहीं हुईं। इच्छायें तो सब वैसी की वैसी हैं। फिर तुमने कुर्बानी की ही नहीं। तो हज करने में जितने नियम बनाये हैं- मुहम्मद साहब ने, अगर इनको ढंग से कोई करता तो खुदा का प्यारा हो जाता, भगवान का भक्त हो जाता, वह भगवत्प्राप्ति कर लेता, लेकिन वह नहीं किया, एक्टिंग सब की।*

*ऐसे ही हम लोग चारों धाम जाते हैं- वृन्दावन, मथुरा, यहाँ और वहाँ, वहाँ दान कर रहे हैं, वहाँ प्रणाम कर रहे हैं। सब नाटक कर आते हैं और लौट कर घर आते हैं तो अपने आपको देखते नहीं कि कहाँ हैं हम। जहाँ थे वहीं हैं, और एक अहंकार और बढ़ गया कि हम यह सब करके आये हैं। ये कमाई करते हैं हम लोग। यानि और गवाँ देते हैं। लोगों पर दुर्भावना, अपने में उच्च भाव- ये दो बड़े शत्रु हैं। दूसरे को छोटा समझना, अपने को बड़ा समझना, इससे बड़ा कोई अवगुण नहीं विश्व में हो सकता। स्वर्ण अक्षरों में लिख लो। जरा से ऑंसू आ गये आप लोगों में से किसी को, भगवान के लिये कीर्तन भजन में। हैं ऽऽऽ वह कुछ नहीं हैं, मेरे तो आँसू आये, मैं बड़ा हूँ। अरे, क्यों गड़बड़ करते हो? अगर गुरु कृपा, भगवत् कृपा से दो आँसू आ गये तो उनकी कृपा मानो। यह तुम्हारी बपौती नहीं है। एक सेकण्ड में छिन जायगी। बड़े-बड़े साधकों का सर्वनाश हो जाता है, तुम्हारी क्या गिनती है। हमेशा अपने को रीड करो, होशियार रहो, सावधान रहो। जैसे जब किसी शहर में कोई साईकिल से चलता है। कहां जाना है, यह भी याद है, पीछे से गाड़ी आ रही है बायें कर लो, बायें मोटर साईकिल जा रही है बीच में रखो, अब खडी कर दो, भई अब खतरा ज्यादा है। हर समय सावधान रहते हैं आप। जरा सी आपने गड़बड़ की, लापरवाही की, हुआ एक्सीडेंट । आप मर गये, या हाथ-पैर टूटा, फ्रैक्चर हो गया। लेकिन वहाँ आप सावधान रहते हैं, क्योंकि उसकी इम्पॉर्टेन्स है आपके मस्तिष्क में और भगवद् विषय का महत्व नहीं समझते आप। अधिक नहीं मानते तो इसलिये वहाँ लापरवाही चल रही है।*

-जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु महाप्रभु जी के प्रवचन का अंश।

Swarg lok

ये स्वर्ग भी हमारे मृत्यु लोक की तरह है , कोई अन्तर नही है | वहाँ भी काम, क्रोध , लोभ , मोह, मद, मात्सर्य , ईर्ष्या , द्वेष सब बिमारियाँ स्वर्ग में भी हैं |

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान्
ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृत: कृतेन |
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ||
( मुण्डकोपनिषद् १-२-१२ )
इस मंत्र का अभिप्राय यह है कि बड़े - बड़े योगियों ने , तपस्वियों ने , अनेक प्रकार के साधन किये किन्तु थक गये | न तो माया निवृत्ति हुई और न आनन्द प्राप्ति हुई | कोई लक्ष्य हल नहीं हुआ | स्वर्ग तक गये | स्वर्ग के सुखों को देखा , भोगा और वैराग्य हो गया |
ये स्वर्ग भी हमारे मृत्यु लोक की तरह है , कोई अन्तर नही है | वहाँ भी काम, क्रोध , लोभ , मोह, मद, मात्सर्य , ईर्ष्या , द्वेष सब बीमारियाँ स्वर्ग में भी हैं |
और वह भी कुछ दिन के लिय मिलता है | तब उन लोगों ने निश्चय किया कि उस ब्रह्म को जानने के लिये , भगवान को पाने के लिये और कोई साधन काम नहीं देगा | केवल एक साधन है | क्या ?
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की शरण में जाना होगा |
श्रोत्रिय , ब्रह्मनिष्ठ , दो शब्द हैं | श्रोत्रिय माने क्या ? जिसको शास्त्र और वेदों का इतना ज्ञान हो कि हमको समझा सके | खाली अपने लिये ज्ञान हो , ऐसा गुरु हमारे काम का नहीं |
जो हमको समझा सके , थियरी तत्व ज्ञान | भगवान् क्या है , जीव क्या है , माया क्या है और भगवत्प्राप्ति कैसे होगी , संसार का सुख कैसा है , मन क्या है , बुद्धि क्या है ? सब निर्णय हो जाय ऐसा गुरु हमको चाहिये | थ्योरिटिकल मैन | लेकिन खाली थ्योरिटिकल मैन होगा , शाब्दिक ज्ञानी होगा , तो भी हमारा काम नही बनेगा |
इसलिये ब्रह्मनिष्ठ भी होना चाहिये अर्थात भगवान् का दर्शन किये हो | खाली शाब्दिक ज्ञान नहीं , प्रैक्टिकल भी हो | दोनो नौलेज जिसमें हों ऐसा गुरु हमको चाहिये |
वेद कह रहा है ;-

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत |
( कठोप. १-३-१४)
अरे मनुष्यों ! उठो, जागो , महापुरुष के पास जाकर शरणागत हो और उनके द्वारा भगवान् का ज्ञान प्राप्त करो |
और हमारे सब ग्रन्थ कहते ही हैं , भागवत कहती है -

तस्माद् गुरुं प्रपध्धेत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम् |
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ||
(भाग. ११-३-२१)

शब्द ब्रह्म में भी परिपूर्ण हो और परब्रह्म माने प्रैक्टिकल भी हो | ये दो शर्ते भागवत भी कह रही है |
ऐसे गुरु के द्वारा समझो और साधना करो तब लक्ष्य की प्राप्ति होगी | - श्री कृपालु जी महाराज के प्रवचन श्रुंखला से |

Friday, 8 May 2020

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ऐसा हुआ था एक बार कि देवताओं और असुरों का युद्ध हुआ। तो बहुत असुर मारे गये। तो असुरों के गुरु शुक्राचार्य, उन्होंने कहा- ये तो बड़ा गड़बड़ हो गया। हमारे तो तमाम असुर मारे गये। अब तो देवता लोग हमेशा दबा लेंगे। तो वह गये तप करने कि ऐसी सिद्धि प्राप्त कर के आवें कि जितने मरे हैं सबको जीवित कर दें। तो देवताओं को खबर हुई। उन्होंने कहा ये तो बड़ी प्रॉब्लम खड़ी हो जायेगी। ये सब जिन्दा हो जायेंगे तो। तो उधर तो वो तप करने के लिये गये और उनके तप को भ्रष्ट करने के लिये इन्द्र ने अपनी लड़की भेज दी। और इधर बृहस्पति ने शुक्राचार्य का शरीर धारण कर लिया, शुक्राचार्य बन गये और असुरों में गये। असुरों ने नमस्ते किया। वह समझे कि हमारे गुरु जी हैं और उनको ये तत्त्वज्ञान बताया कि शरीर ही सब कुछ है। इसका सुख ही सब कुछ है। वह चार्वाक् सिद्धान्त हुआ। और उनसे ये भी कह दिया कि देखो एक देवता हमारा शरीर धारण करके आएगा, जब आवे तो उसको मार कर भगा देना। अब शुक्राचार्य की तपस्या को भंग कर दिया इन्द्र की लड़की ने। अब वो आये जब असुरों के पास तो उन्होंने कहा गेट आउट। दंग रह गये गुरु जी। क्या हो गया इन लोगों को। इतनी हमारी पूजा करते थे रोज। और आज ये हमारा अपमान कर रहे हैं। अरे! मैं शुक्राचार्य हूँ। हाँ हाँ, मालूम है, मालूम है। जाओ, जाओ नहीं पिट जाओगे अभी। वो बिचारे भाग आये। तो ये इसलिये बृहस्पति ने एक सिद्धान्त बनाया असुरों के लिये कि वह आगे स्प्रिचुअल पावर न पा सकें। इसी में लिप्त रहें, विषय भोग में।

अस्तु चार्वाक् का सिद्धान्त है अपने स्वार्थ मानव-शरीर के अर्थ तक सीमित रहो। वैसे तो सुनने में आप लोग सोचते होंगे बड़ा बेवकूफ था। बड़ा गलत सिद्धान्त है। लेकिन आज छह अरब आदमी में ६ लाख भी नहीं निकलेंगे ऐसे जो इस सिद्धान्त को प्रैक्टिकल मान लें। जैसे आपका अटैचमेन्ट माँ में है, बाप में है, भाई में है, परिवार में कहीं है? हाँ है। "तो_फिर_आप_चार्वाक्_से_नीचे_हैं।" चार्वाक् कहता है- केवल अपने शरीर तक रहो। माँ, बाप, भाई, बहन दुःखी हों, रोवें, गायें, मरें उसे मत सोचो। और आप तो और लोगों में अटैचमेन्ट किये बैठे हैं। केवल शरीर में अटैचमेन्ट रखना ये चार्वाक् सिद्धान्त है। तो यहाँ तक पहुँचे हुए कितने लोग हैं जो केवल शरीर तक अपने सीमित हों, न कहीं राग हो, न कहीं द्वेष हो। बस शरीर में ही राग, अटैचमेन्ट।

-जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु महाप्रभु जी के प्रवचन का अंश।

Sunday, 3 May 2020

Shri Maharaj ji

एक बार ध्यान से पढ़ें :- 
हमारे गुरूदेव श्री कृपालु महाप्रभु जी ने इस कलयुग में हम जीवों की काफी दयनिए सोचने व समझने की शक्ति , कलुषित बुद्धि , भोग विलास की लालसा से पिड़ित एवं  अधिकता और अज्ञानता के जंगल में भटकते हम जीवों के उद्धार हेतु अवतरित होकर बहुत साधारण भाषा का उपयोग करते हुए तत्त्वज्ञान दिए एवं हमारे परमकल्याण के लिए अपने जीवनलीला पर्यन्त अथक प्रयास किए । 

फिर भी कुछ नासमझ लोग श्री महाराज जी के इस साधारण भाषा में दिए गए तत्त्वज्ञान के अर्थ को भी समझने में सफल नहीं होते हैं और उनके कहे गए आदेशों , सिद्धांतों के अर्थ का अनर्थ करके सोसल मिडिया पर जहर उगलने का काम कर रहें हैं , इन लोगों से सावधान रहने की बहुत आवश्यकता है ।
ए लोग अपना तो अहित कर हीं रहें हैं बेचारे कुछ लोगों को भी बर्बाद करने का ठान लिए हैं । इनसे बचकर रहना हमारे हित में हैं 
ए लोग श्री महाराज जी के केवल एक  बात को बहुत महत्त्व देते हुए उनके बांकी सारे सिद्धांतों और तत्त्वज्ञान को भुलाए बैठे हैं । क्योंकि इनका मकसद श्री महाराज जी के कुछ एक दो बातों को हथियार बनाकर के उनके और उनके अपने जन , दास ,दासी ,‌प्रचारकों के खिलाफ  इस्तेमाल करना एक मात्र उद्देश्य है । हमें श्री महाराज जी के हरेक निर्देशों का पालन करना चाहिए नहीं तो एक दो बात का पालन करने से कुछ नहीं होगा ।

ए लोग श्री महाराज जी के अस्सी के दशक में कहें एक अंतरंग बात को सार्वजनिक करके लोगों को भ्रमित कर रहें हैं जिससे नए साधक भ्रमित होकर कौमेंट करने लगे हैं,‌सोचने लगे हैं  कि अगर गुरूदेव और हरि को रात दिन भजने वाले उनके प्रचारकों को भगवद् प्राप्ती नहीं हुई अबतक  तो उन्हें क्या लाभ होगा ......... ? आदि आदि ।

सोसल मिडिया पर कुछ क्षुद्र बुद्धि से ग्रसित ऐसे पोस्ट लिखने वाले को श्री महाराज जी के इस कथन का भानतक नहीं है कि श्री महाप्रभु जी ने स्वयं निर्देश दिया हैं कि संसार में भी किसी भगवान को भजने वाले संसारी को या साधकों को बाहर से देख कर हम साधारण जीव कदापी नहीं जान सकते कि वो क्या है और कहां तक पहुंचा है । क्या प्राप्त किया है क्या नहीं ।

फिर उनके प्रचारकों के उपर , उनके अपने जन , उनके अपने दास दासियों के उपर उनके एक बात को आधार बना कर कटाक्ष करना उनका अपमान करना है और नामापराध के सीवा कुछ भी नहीं ।

श्री महाराज जी , आध्यात्म ज्ञान एवं गुढ़ तत्त्वज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए अपने लीला काल में लगभग चालीस प्रचारक एवं प्रचारीकाओं को तत्त्वज्ञान की शिक्षा में पारंगत कराकर ,‌योग्य बनाकर , अपना बरदहस्त उनके सिर पर रखकर उनको हमारे बीच भेजें हैं हमारे कल्याण के लिए ।

 ये सभी आदरणिय प्रचारकों की अपने गुरूदेव के प्रति दृढ़ निष्ठा ,‌विश्वास, समर्पण , शरणागति , सेवा भाव काफी उच्च कोटी का है जो हमारे लिए अनुकरणीय है । और श्री महाराज जी का हीं यह निर्देश है कि हमें इन्ही प्रचारकों का अनुगमन करते हुए अपने हरि गुरू की भक्ति में आगे बढ़ना है । नहीं तो जो अपनी खोपड़ी  लगाया उसका पतन अवश्य होगा ।

 उनके सभी प्रचारक श्री महाराज जी के सिद्धांत से व उनके तत्वज्ञान से अलग कुछ भी नहीं कहते कभी । 
कुछ लोग ये भुल जातें हैं कि श्री महाराज जी ने अपने द्वारा नियुक्त अपने सभी प्रचारकों के कहे बातों का खुद गारंटी लिए हैं और कहे हैं कि" ए लोग जो कुछ भी बोलते हैं उसकी गारंटी मैं लेता हुं । ए लोग जो कुछ भी बोलते हैं उसको ध्यान से सुनों और लाभ उठाओं ।" 

 श्री महाराज जी अपने उसी समय के उसी प्रवचन के विडियो में आगे डिटेल से वो सभी बातों को समझाएं हैं पर नासमझ लोग विडियों अपने अनुसार काट छांट करके लोगों को भ्रमित कर रहें हैं उनके प्रचारकों के खिलाफ  जो एक बहुत बड़ा नामापराध  है ।

 उनके कोई भी प्रचारक कभी यह नहीं कहते की तुम मेरी पुजा करो अपने गुरू के जगह । 

अरे उनके प्रचारकों को  तो अपार दु:ख होता है जब गुरू की जगह उनका कोई तारिफ करता है ! 
और श्री महाराज जी ने तो नास्तिकों के प्रति भी दुर्भावना‌ करने से मना किएं है ।‌ उन्होंने तो हमें बतलाए हैं कि एक क्षण में कोई भी बड़े से बड़ा नास्तिक भी सबसे आगे कब बढ़ जाए और भगवद् प्राप्ति करले,  कोई नहीं जान सकता ।

दुसरा बात कि कोई भी अबतक  भगवद् प्राप्त कर लिया या नहीं हम नहीं जान सकतें हैं । क्योंकि श्री महाराज जी के सिद्धांतों को ,निर्देशों को मानने वाले उनके " गोपनियम , गोपनियम , गोपनियम वाली निर्देश का भी पालन करतें हैं ,  सौफी सदी मानते हैं और भगवद्प्रेम को छुपाते हैं । 

आज पृथ्वी पर न जाने कितने भगवद् प्राप्त संत हैं । लेकिन वो खुद को गुप्त रखतें हैं ।
और कोई भगवान के स्वरूप शक्ति विशिष्ट का अंश ,नित्य सिद्ध हीं मुल जगद्गुरू के पद को जीव कल्याण हेतु स्वीकार करतें हैं । और वहीं प्रेम दान का अधिकारी होतें हैं । शेष भगवद् प्राप्त भी अपने गुरू की हीं सेवा करते रहते हैं भगवद् प्राप्ति के उपरांत भी । और अपने को छुपाकर रखतें हैं । 

एवं स्वयं गुरूदेव भी उनके इस गोपनियता कि रक्षा करतें हैं हम जीवों के हित में । नहीं तो हम हरि गुरू की भक्ति से विमुख हो जाएंगे , और कोई भगवद् प्राप्त जीव यह नहीं चाहता है कि हम अपने हरि गुरू से  विमुख होकर उनकी भक्ति करें । लेकिन हम उनका अपमान करें यह गुरूदेव स्वीकार नहीं करते कभी ।

श्री महाराज जी के तीनों पुत्रियां , हमारी दिदियां । उनके पुत्र एवं उनके द्वारा नियुक्त प्रचारक हीं अब हमारे बीच उनका प्रतिनिधि हैं , उन्होंने स्वयं इन सभी का नियुक्ति अपने द्वारा दिए गय तत्त्वज्ञान और साधना संबंधी मैटेरियल के प्रचार प्रसार हेतु किएं हैं । जन जन तक आगे के पीढ़ियों में उनका तत्व ज्ञान का लाभ पहुंचता रहे इसी  उद्देश्य हेतु गुरूदेव ने इनको तैयार किएं है ।  आज हमारे बीच ए सभी हरिगुरू के निज जन है , हमें यह नहीं भुलना चाहिए । 

हमारे प्यारे गुरूदेव अपने लीला संवरन के  बाद अपने मुल भगवद्‌स्वरूप में अपने धाम गोलोक में हैं और हमारे ह्रदय में भी हैं ।
फिर भी उनकी प्राप्ति डाईरेक्ट , अब उतना सहज नहीं है जितना वो स्वयं अपने स्थूल शरीर में हमारे बीच थे , तब था ।

अतः अब हम सभी अपने गुरूदेव के तीनों पुत्रियां ( तीनों हमारी प्यारी दिदीयांँ ) और उनके प्रचारकों का अनुगामी होकर अपने प्यारे गुरूदेव और अपने इष्ट की अनुगात्मिका ,  रागात्मिका भक्ति करते हैं जो सर्वथा उचित है। ये सभी आदरणिय एक मार्ग और माध्यम है गुरूदेव की सेवा और भक्ति करके उनको प्राप्त करके उनसे भगवद् प्रेम दान पाने का । 
हमें इनके प्रचारकों के योगदान को नहीं भुलना चाहिए । 

और हम लोग तो श्री महाराज जी का पद् गाते हैं कि 
" हमको आप अपने  दासी के दासी के दासी के दासी बना दें । तो फिर उनके दासों का अपमान कितना बड़ा अपराध  है ।
अतः हम यह नहीं जानते की कौन क्या है इस जगत् में, इसलिए हमें सामयिक कहे गय उनके वाणी का दुरूपयोग करके उनके हीं जनों का अपमान करने का कोई हक नहीं है । 

नहीं तो ऐसे लोग ,‌ऐसा करने वाला अपना विनाश इसी तरह तर्क,  कुतर्क , अति तर्क , विचित्र विचित्र तर्क करके कर लेगें और दुसरे को भी भटका देंगें । सावधान ।  ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए । भगवान इनका भला करें , सद्बुद्धि दें ।  श्री राधे ।

Sharad Gupta bhaiya , Meenu Kapoor Didi, Prachi Gupta , didi आदि गुरूदेव के  प्रचार प्रसार में तो इनका सहयोग करके गुरूदेव की हीं सेवा कर रहें हैं । अतः आप सभी श्रद्धालुओं से आग्रह है कि कुछ तत्काल भ्रमित करने वाले कुसंगी से दुरी बनाए रखे  बिना किसी राग ,‌द्वेष एवं दुर्भावना के ।