Thursday, 30 April 2020

Parliament and Court

As per current laws salary is payable unless parliament passes laws for curbing salary in certain circumstances
Vikash Agarwal  but how can a high court judge pass any order When his own salary is linked to it?

It is as per the act passed by law ministry and act not passed by high court. There will be no conflict of interest. HC can interpret any law passed by state assembly  and can term them unconstitutional. They have this right as per Constitution. PIL ( public interest litigation) also affect HC and SC court judges as citizen or public. There is no conflict in those cases and hence no conflict in this case also

Vikash Agarwal so which one is Supreme parliament or SC

Vikash Agarwal that's secondary. I think SC cannot overrule elected parliament. Sc judges has become megalomaniacs. They forgot thier jurisdiction and overstepping limits

SC can only interpret Constitution or provisions of any Act passed by govt
CG or SG are free to pass any laws And courts are free to interpret them in case of litigation

Courts cannot pass or enact any law

Only parliament and assemblies can pass a bill and make it a Law

Parliament and Assembly can over rule a judgement by passing new law in parliament or assembly....No one can stop them

But once an Act is passed and laws framed And  dispute arises then SC is supreme

loan defaults and write off

Writing off is only book entry
Waiver is legal right forgone
Write off is done on basis of Ind AS and statutory auditor instructions on basis of basic accounting principle of conservatism

There is not a single case of waiver of loan.  What has been done is purely in compliance with universally accepted accounting practice. 
The loans were due for a long period, hence provision for Bad/Doubtful loan was made as per accounting practice. 
Their policy is that if a loan is not recovered within 4 years from the date of making 
‘provision for Bad/Doubtful loan’, then it has to be written off in the books of accounts and so after 4 years elapsed , they have written off the amount from their books of accounts only and Memorandum record will be maintained for all such cases for following up, filing suits , attaching the loanees’ assets , if any, etc. exactly in the same manner that would have been followed had the amount not been written off.  
This is totally their internal issue in compliance with their accounting policy.  

https://www.businesstoday.in/sectors/banks/bad-loans-worth-rs-80893-crore-written-off-by-banks-till-september-quarter/story/391460.html

And when will be the bad loans recovered from defaulters....

Through legal recourse only. Because affected parties take legal recourse. Harsh measures only after that ....Govt decisions gets challenged up to supreme court level. Until all legal course is satisfied no arrest or coercive action can be made. This is our Indian Constitution and we are all bound by that.

we have to follow the Constitution....We cannot take the fundamental rights of citizen to appeal

Even if we know a person is guilty....bedore punishing they have to be proven first in courts if litigated .....

That’s the problem wait for 10 years . 

Alas....We have to live with slow legal system

Saturday, 25 April 2020

Sadhna ke Niyam

★★ #श्रीकृपालु_भक्ति_धारा ★★

यह जो आपका मन अशान्ति और अतृप्ति से सदा विचलित रहता हैं, इसमें बस एक ही मुख्य कारण हैं कि--

आपको भगवान पर, संतो/महापुरुषों पर उनके उपदेशों पर पूर्ण श्रद्धा और अटल विश्वास नही हैं, बिलकुल नही हैं, ये पक्का मान लो !

और इस अश्रद्धा और अविश्वास का मुख्य कारण हैं हृदय की मलिनता अर्थात् अभी आपका हृदय बहुत अधिक पापयुक्त हैं (अनंत जन्मो में किये गये गंदे संसारी चिन्तन और पाप आदि करने के अभ्यास के फलस्वरूप) ।

इस रोग का बस एक ही उपचार हैं:-

"निरंतर भगवद्भजन/हरि-हरिजन का चिन्तन"।

भले ही आपका मन भगवद्भजन में ना लग रहा हो (क्योकि कभी लगाने का अभ्यास दृढ़ता से किया ही नही हैं) लेकिन फिर भी जुट जाओ अपनी पूरी शक्ति लगाकर "निरंतर हरि-गुरु चिन्तन करने में" और ये भी ध्यान रखो कि हरि-हरिजन के प्रति अनुकूल चिन्तन ही हो, विपरीत भाव हृदय में आते ही इस प्रकार उसको सावधानी से भगा दो जैसे भोजन के समय ध्यान रखते हो कि कंकड़ आदि ना आ जाये और यदि फिर भी कोई कंकड़ आ जाता हैं तो तुरंत उतना भोजन ही उगल देते हो, 

वैसे ही तुरंत उस विपरीत भाव और विपरीत भाव लाने वाले कारण दोनो से ही तुरंत पीछा छुड़ा लो, अगर वास्तव में अपना कल्याण/भला चाहते हो तो अन्यथा पतन के गर्त में और भीतर चले जाओगे ।

और इस प्रकार भजन का अभ्यास करते-करते जैसे-जैसे हृदय पर से मैल की परत उतरती चली जायेगी और हृदय शुद्ध होता जाऐगा वैसे-वैसे ही आपको भगवान और संत और अधिक प्रिय लगने लगेंगे और उनकी वाणी पर भी श्रद्धा बढ़ती जाएगी और जैसे ही ये श्रद्धा-विश्वास 100% हुआ कि तुरंत आपका समस्त कार्य सदा-सदा को सिद्ध हो जायेगा और सदा को नष्ट हो जायेगी अतृप्ति/अशान्ति/क्लेश ।

#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।

#साधना_के_नियम :-

1. रूपध्यान करते हुए ही संकीर्तन करो।
2. निरन्तर मौन व्रत का पालन करो।
3. अत्यंत दीन भाव उत्पन्न करो।
4. हरि-गुरु के अनुकूल ही चिन्तन करो।
5. अन्य साधकों में सम्मान की भावना करो।
6. भाव प्रकट करने का दंभ भी न करो।
7. मोक्ष-पर्यन्त की कामना कभी न करो।
8. क्षण क्षण सर्वत्र-सर्वदा हरि स्मरण करो।

#जगद्गुरूत्तम_स्वामी_श्री_कृपालु_जी_महाराज।

Thursday, 23 April 2020

Comparing oneself with others

साधक को कभी दूसरे की ओर देखना ही नहीं चाहिए क्योंकि हम जो देखेंगें , वह उसका बाह्य स्वरुप होगा | हम किसी के अंदर की बात को नहीं जान सकते | इस बात को समझाने के लिए श्री महाराज जी एक सेठजी का बड़ा सुन्दर प्रसंग सुनाया करते हैं जो इस प्रकार है -
एक सेठ जी थे | वे कभी भगवान का नाम न लेते और न मंदिर जाते | सेठानी परेशान रहती | एक दिन सोते समय अंगड़ाई लेते हुए सेठ जी के मुख से 'राधाऽऽऽ' निकला , जिसे सेठानी ने सुन लिया और जुट गई सवेरे-सवेरे दान - पुण्य की व्यवस्था में | ब्राह्मण भोज का इंतजाम होने लगा | सेठ जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज न तो जन्माष्टमी है , न रामनवमी और न ही कोई अन्य त्योहार | इस प्रकार दान-पुण्य और ब्राह्मण भोज का क्या कारण हो सकता है ?
पत्नी से यह सुनते ही कि उनके मुख से ' राधे ' नाम निकल गया है, सेठजी के प्राण निकल गए |
भक्ति के तरीके सबके अपने-अपने हो सकते हैं | अब उपर्युक्त प्रसंग में देखिए न ! सेठजी इतने बड़े भक्त थे , किन्तु सेठानी उन्हे नास्तिक समझती थी | 
श्री महाराज जी का साधको के लिए  आदेश है -
' सदैव याद रखो | कोई व्यक्ति खराब हो , नामापराधी हो , पापी हो , उसके प्रति भी दुर्भावना न करो | क्या कोई ऐसा पापी है विश्व में , जिसके अंत:करण में भगवान श्रीकृष्ण न बैठे हों |' 
दुर्भावना द्वेष की जड़ है | द्वेष हमसे अनेक अपराध कराता है और हमारा ह्रदय पाषाण सम होने लगता है | गुरु के अथक प्रयास से जो भक्ति का अंकुर हमारे ह्रदय में फुटने लगता है , वह बारंबार इसकी आवृत्ति से कुम्हलाने लगता है इसलिए हमें सदा सावधान रहना चाहिए | ह्रदय में कोइ गलत चीज़ न आने पाये | जहाँ अच्छी चीज़ दिखाई पड़े , उसे अवश्य ग्रहण करना चाहिए | किन्तु जहाँ खराब चीज़ दिखाई पड़े , वहां सावधान रहना चाहिए कि पता नही क्या रहस्य है ! हम क्यों गलत भाव अपने मन में लाकर अपना मन गंदा करें | 
कौन उच्च कोटि का साधक है , कौन निम्न कोटि का अथवा कौन कब उच्च साधक हो जाए और कब किसका पतन हो जाए , कहना मुश्किल है | 
आपने तो सुना ही होगा अजामिल के विषय में ! एक क्षण के कुसंग ने उसको कितना बड़ा पापी बना दिया | 
बड़े - बड़े योगी का पतन हुआ , तो बड़े से बड़े पापी का संस्कार जागने पर उसे भगवत्प्राप्ति हुई | उसे भगवत्प्रेम मिला | कौन कब उठ जाए ? कौन कब गिर जाए ? कोई नही कह सकता | इसलिए कभी भी दूसरे के प्रति दुर्भावना नहीं करनी चाहिए | 
हमारे अंदर दुर्भावना पनपने का मुख्य कारण है - स्वयं की दुसरे से तुलना करना और अपने-आपको अच्छे होने का सर्टिफिकेट दे डालना | यही दुर्भावना साधना करने पर भी हमें आगे नहीं बढ़ने देती | सब जगह हम दूसरों के प्रति छोटी भावना कर लेतें हैं | तुच्छ भावना ! हमें इससे बचना चाहिए | हम अल्पज्ञ यह नही जान सकते कि हम सही हैं या नही | हममें यह क्षमता ही कहां ? 
    ---- श्री महाराज जी

Wednesday, 22 April 2020

aadhyatmik vidya

#न_गुरु_न_चेला_फ़िरे_कृपालु_अकेला....☝🏻

#प्रश्न : सांसारिक विद्या भी जब किसी गुरु के बिना नहीं आती है फिर आध्यात्मिक विद्या कैसे आएगी? शास्त्र कहते हैं कि वह गुरु से ही शिष्य को मिलती है -"आचार्यवान पुरुषो हि वेद", फिर  #आप_कैसे_कहते_हैं_कि_आप_का_कोई_गुरु_नहीं_है?

#उत्तर : 16 वर्ष के पश्चात की हमारी सब बातें लोकवत नहीं हैं, संसारी नियम-कानून के अनुसार नहीं हैं, जबकि लोग उसी के अनुसार समझना चाहते हैं। ऐसा कोई विषय नहीं है, चाहे वह संसारी हो या आध्यात्मिक, जिसको मैंने A, B, C, D से शुरू किया हो। भारत का कोई व्यक्ति बता दे कि हमने उससे कुछ सीखा हो, पढ़ा हो। एक अक्षर भी पढ़ा या सीखा हो, तब तो कहा जा सकता है कि बुद्धि तीव्र थी, इसलिए जल्दी सीख लिया। लेकिन ऐसा कोई निमित्त ही नहीं दिखाई देता। किसी ने हमें किताब लेकर पढ़ते भी नहीं देखा।

सब यही समझते हैं कि संसार में कोई निमित्त होना चाहिए। रामकृष्ण आदि अवतारों तथा आदि जगदगुरु शंकराचार्य ने भी कोई निमित्त बनाया जबकि हमने कोई निमित्त ही नहीं बनाया तो क्या बतावें। संसार वालों में इस बात को समझने की शक्ति नहीं है।

16 वर्ष की आयु में किसी व्यक्ति को एक भाषा का भी पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता। समस्त शास्त्र-वेदों का पूर्ण ज्ञान तो हजारों वर्ष पढ़ने पर भी नहीं हो सकता। कोई पढ़े और उसको कोई विद्या आ जाय, यह भौतिक नियम है। किसी को कोई विद्या थोड़ा पढ़ने से ही आ जाय, यह संस्कार जन्य बात है। किन्तु किसी को बिना पढ़े मिल जाय, #यह_अलौकिक_है। ऐसा उसी को होता है #जो_भगवत्शक्ति_से_जुड़_जाता_है। जब ईश्वर से किसी का कनेक्शन हो जाता है, उसे वहाँ से वह शक्ति मिल जाती है। उसको समस्त विद्याओं का ज्ञान, जिनको वह जानना चाहता है, #बिना_पढ़े_ही हो जाता है।

#जगदगुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।

Monday, 20 April 2020

pracharak

१.  प्रश्न :_ गुरु की शरणा गति सर्व प्रथम अनिवार्य है ?
अगर हम प्रचारक के शरण में जाते है तो हमारे लिये ठीक है ? 
इन प्रचारक कों भगवत प्राप्ति हो गई हैं क्या ?

  श्री महाराज जी :_ हमारे किसी भी प्रचारक कों भगवत प्राप्ति नहीं हुई है  _ये बात आप सब लोग कान से सुनले, समझ लें ।मै आप लोगों को धोखा नहीं दे सकता । सब थेउरी का प्रचार करते है ( तत्व ज्ञान ) मै सारी इंडिया या विदेशों में जकर नहीं बोल सकता तो मैं इन लोगों को कहता हूँ की तुम लोग  मेरा आदेश  सुनाओं जनता को ।श्री कृष्ण कौन  है ? राधा कौन है , जीव क्या हैं ? जीवका श्रीकृष्ण से क्या संबंध है,और उस संबंध के बाद क्या उपाय हैं_और फिर वो प्राप्ति के बाद क्या मिलता है । क्या परहेज करना है  ।इस तमाम बातों को वो लोग प्रचार करते है ।अगर कोई प्रचारक अपने आप को गुरु रूप में De -clare- करता है  तो वो हमारा द्रोही है । गुरु द्रोही है । हमने तो आज्ञा कर के रखे है कि कोई प्रचारक अपना चरण स्पर्श भी न करावे । तो फिर किसी प्रचारक को कोई गुरु मानेगा तो फिर मरे उसकी जिम्मेवारी हमारी ऊपर नहीं होगी। प्रचारक का काम है तत्वज्ञान कराना ।उसको आप लोग दस बार नहीं हजार बार सुनिये । बार बार श्रावण से ही तत्व ज्ञान दृढ होता है ।प्रचारक को भैया या दिदी दो ही भाव से देखिये । उसको महापुरुष या भगवान के भाव से न देखियेगा । अन्यथा सर्वनाश हो जायेगा । घोर पतन हो जाएगा और उसके जिम्मेवार तुम होंगे । गुरु तत्व जो है वो श्रोतिय ब्रह्म निष्ठ के लिये ही लागू होता है अर्थात् शास्त्र वेदाे  का  थेउरी  का  ज्ञान  भी हो पलस श्री कृष्ण भगवान को साक्षात्कार भी हुवा हो । वो गुरु होने का योग्य होता है ।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ...!
श्री महाराज जी की प्रवचन से ....
राधे राधे 🙏

jai shri Krishna

☝🏻 *श्रीकृष्ण कहते हैं*  :-☝🏻

*स्वर्ग  का  सपना  छोड़  दो*,
     *नर्क   का   डर   छोड़   दो* ,
      *कौन   जाने   क्या   पाप ,* 
              *क्या   पुण्य* ,
                   *बस............*
    *किसी   का   दिल   न   दुखे*
      *अपने   स्वार्थ   के   लिए* ,
                   *बाकी   सब* ......
          *कुदरत   पर   छोड़   दो*
*ना पैसा  बड़ा.. ना पद बड़ा ।*
*मुसीबत में जो साथ खड़ा...*
*वो सबसे बड़ा*।।
        
       *🙏🏻जय श्री कृष्णा🙏🏻*


 सब का सम्मान करो गोविंद राधे। 
 सब के हैं उर बैठे कृष्ण बता दे।। 

"Treat everyone with respect because #Shri_Krishn is inside their hearts," says Compassion is an essential prerequisite for those on the path of 'bhakti'.

Sunday, 19 April 2020

Shri Maharaj ji

सुश्री ब्रज मंजरी जी का जन्म पकिस्तान के मुल्तान नामक शहर में हुआ तत्पश्चात उनका परिवार आगरा में निवास करने लगा | यदपि इस जन्म में परिवार द्वारा इन्हे भक्ति का कोई वातावरण नहीं प्राप्त हुआ, किन्तु फिर भी श्री कृष्ण प्रेम के स्वाभाविक संस्कार इनमे इतने प्रबल थे की एक बार वे घर छोड़ कर वृन्दावन भी गयीं | कुछ दिन वहा रह कर वे लौटीं और पढ़ाई पूर्ण की | 

मंजरी जी ब्रज सहचरी जी के कॉलेज में संस्कृत (MA) की छात्रा थीं | वे देखती की सहचरी जी कॉलेज की बस लेकर कही जातीं है | उनके पूछने पर सहचरी जी ने बताया की वे उनके गुरु जी के सत्संग में जाती है | ये सुनते ही मंजरी जी के प्रसुप्त संस्कार मानो अकस्मात् जागृत हुए | मानो इन्हे भगवद कृपा से अपने गुरु के दर्शन का आंतरिक आमंत्रण प्राप्त हुआ | 

आगरा में सन १९५८ में इन्होने श्री महाराज जी के प्रथम बार दर्शन किये | श्री महाराज जी ने इन्हे प्रथम दर्शन में ही इशारा किया की वे उन्हें प्रचारक बनाएंगे | उन्होंने ये भी बताया की संस्कृत में MA करने की प्रेरणा उन्होंने ही दी थी | 

मसूरी में सन १९६५ में श्री महाराज जी ने मंजरी जी को प्रचारिका बनाया | इनका पूर्व नाम था 'शकुंतला सरदाना' | नियमित रूप से प्रचारक बनने के पूर्व ही महाराज जी के आदेशानुसार वे प्रवचन देती थीं | ब्रह्माण्ड घाट सन १९६४ में भी इनके प्रवचन हुए | इनके प्रवचन में ये विशेषता थी की इनका प्रत्येक प्रवचन श्री महाराज जी जैसा ही होता था | जो श्री महाराज जी बोलते, वो वैसा ही उसको दोहरातीं | अपनी ओर से एक वाक्य तक नहीं निकलता | 

इनके प्रवचन अत्यंत प्रभावशाली होते थे | एक बार किसी शहर में श्री महाराज जी के प्रवचन हो रहे थे | प्रवचन के एक दिन श्री महाराज का गला ख़राब हुआ | उन्होंने अपनी जगह मंजरी जी को बोलने का आदेश दिया | प्रवचन के पश्चात प्रेमानंद जी (ब्रज किशोरी जी के पिता) किसी काम से बाज़ार गए | वहा लोगों ने उन्हें पहचाना और कहा "बुरा न मने लेकिन देवी जी अपने गुरु जी से अच्छा बोलती हैं" | ये बात उन्होंने महाराज जी से कही | महाराज जी प्रसन्नता पूर्वक बोले "बाप को ख़ुशी होती ही है जब बेटा अधिक काबिल हो जाये !" मंजरी जी कुछ शरमाई |

मंजरी जी के माद्यम से श्री महाराज जी को कई अंतरंग भक्त व प्रचारक प्राप्त हुए हैं | अब अधिकतर वे मनगढ़ धाम में रह कर भक्तों की रसोई का पर्यवेक्षण करतीं हैं | यदा कदा अपने क्षेत्र में प्रचार हेतु अब भी जाती हैं || 

Sushri Braj Manjari Ji was born in Multan, Pakistan. After the partition of India, her family moved to Agra. In this life, she was never exposed to any devotional atmosphere however, her past sanskars were so strong that once she ran away from home and lived in Vrindavan for some time. 

Upon returning, she completed her BA degree and started her MA in Sanskrit. She used to study in Braj Sahachary Ji's college. She noticed that Sahachary Ji would often take the college busses in the evening. One day, she asked her. Sahachary Ji told her about Shri Maharaj Ji. Merely hearing about Maharaj Ji's personality forcibly attracted her. She insisted on meeting Shri Maharaj Ji. 

In Agra in 1958, Manjari Ji first met Shri Maharaj Ji. Upon this first meeting, Shri Maharaj Ji indicated to her that she will become a preacher. He also told her that it was becasue of His internal inspiration that she had decided to pursue her Master's in Sanskrit. 

1965 in Mussoorie, Shri Maharaj Ji formally appointed Manjari Ji as His preacher. Prior to this, her name was Shakuntala Sardana. According to Shri Maharaj Ji's instructions, Manjari Ji used to preach before formally being appointed. She has even given lectures at the 1964 Brahmand Ghat sadhana program alongside Shri Maharaj Ji and a couple other preachers. Her lectures had a very unique quality; she would speak exactly as Maharaj Ji, down to every word. She would not utter a word in any speech, which had not been spoken by Shri Maharaj Ji. Due to this, her lectures were immensely powerful. 

Once Shri Maharaj Ji's lecture series were going on in some city. One of the days, Maharaj Ji fell ill and instructed Manjari Ji to speak on His behalf. In those days, Premanand Ji (Braj Kishori Ji's father) was Shri Maharaj Ji's secretary. He went to the market for some work. The people recognized him and said "Please don't mind, but Didi Ji speaks better than her Guru Ji". Premanand Ji came and told this to Maharaj Ji. Maharaj Ji smiled and said "A father is happy if his child becomes more qualified that him!". Upon hearing this, Manjari Ji blushed. 

Through Manjari Ji's lectures, many close devotees and preachers have come into the association of Shri Maharaj Ji. Nowadays, she resides in Mangarh and is fully devoted in her seva of overlooking the entire ashram kitchen. Once in a while, she also travels to various cities to preach. Her personality is very calm and reserved. 

-- Photo: Mangarh, 1965

Saturday, 18 April 2020

Tatwa

💐💐💐💐गुरू तत्त्व💐💐💐💐
अभी तक हमने जाना कि तीन तत्त्व हैं - वह,  मैं  और यह । अर्थात् ब्रह्म, जीव और माया । फिर यह चौथा गुरू तत्त्व कहांँ से आ गया ? वेद व्यास जी कहतें हैं -

 'नास्ति तत्त्वं गूरो: परम् ।' 

गुरू के आगे कोई तत्त्व ही नहीं है । परतत्त्व यानी अंतिम तत्त्व गुरूतत्त्व है । यह वेदव्यास भगवान के अवतार लिख रहें हैं । कौन उँगली उठावे । 
पर स्वाभाविक प्रश्न है - जब वेदों में, शास्त्रों में परतत्त्व श्रीकृष्ण को बताया गया है, तो गुरू कैसे परतत्त्व हो जाएगा ।

इसका उत्तर वेद देता है कि गुरू तत्त्व भगवान से बड़ा नहीं है । लेकिन है भी । मतलब ! मतलब यह कि हम अपने स्वार्थ की दृष्टि से गुरू तत्त्व को भगवान से बड़ा मानते हैं । वास्तव में हैं नहीं , किन्तु मानतें हैं । क्यों ? इसलिए  कि भगवान को जानना सबसे पहले जरूरी है । श्रीकृष्ण कौन हैं ? उनसे हमारा क्या संबंध है ? उनकी प्राप्ति क्यों की जाए ? उनकी प्राप्ति कैसे की जाए ? यह सब ज्ञान सबसे पहले आवश्यक है । यह ज्ञान वेदों से प्राप्त होगा । किसी भी ज्ञान की अंतिम आथोरिटी वेद है । हम वेद पढ़कर भगवान के बिषय में  जान लेंगें । सबकुछ लिखा है वेद में । लेकिन आप जानते हैं कि वेद अलौकिक वाणी है । हाँ अलौकिक ! अलौकिक वाणी को समझने के लिए अलौकिक बुद्धि चाहिए । यानि अपौरूषेय वेद को समझने के लिए अलौकिक बुद्धि चाहिए । अलौकिक बुद्धि तो हमारी है नही ! फिर ज्ञान कैसे होगा ? इसलिए वेद ने कहा - देखो, तुम लोग मुझे मत पढ़ना । खबरदार ! 

'आचार्यवान पुरूषो हि वेद ।
तद् विज्ञानार्थं स गुरूमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।'

बार-बार वेद कह रहा है कि श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ महापुरूष की शरण में जाओ । जिसे हम परतत्त्व कह रहें हैं अर्थात् भगवान् , वह गुरू के द्वारा हीं प्राप्त होगा । इसलिए शास्त्रों ने, संतों ने और यहांँ तक की भगवान ने भी गुरू को परतत्त्व कहा और भगवान से बड़ा माना । आदिपुराण में वेदव्यास जी ने  कहा -
' मद्भक्तस्य ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मता: ।' 
जो मेरे भक्त हैं,वे मुझे उतने प्रिय नहीं । जो मेरे भक्त के भक्त हैं , वे मुझे अधिक प्रिय हैं । 
भगवान् कहते हैं - 

'तस्माद् गुरूं प्रपद्येत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम् ।
शाब्दे परे च निष्णातं  ब्रह्मण्युपशमाश्रयम ।।'

अर्थात् जो परम कल्याण का जिज्ञासु हो , उसे गुरूदेव की शरण लेनी चाहिए । गुरूदेव ऐसे हों , जो वेद का ठीक-ठीक परिज्ञान करा सकें; और साथ ही परब्रह्म के परिनिष्ठित तत्त्वज्ञानी भी हों, ताकी अपने अनुभव द्वारा प्राप्त हुई रहस्य की बातों को बता सकें । उनका चित्त शांत हो, व्यवहार के प्रपंच में बिशेष प्रवृत्त न हों ।

अत: या तो गुरू एवं श्रीकृष्ण की समान रूप से साथ-साथ भक्ति की जाए या केवल गुरू की भक्ति की जाए , फल वही मिलेगा । केवल भगवान की भक्ति से डाईरेक्ट कुछ नही मिलेगा । भगवान तो अनादिकाल से हमारे अंत:करण में बैठें हैं , पर हम सदा से दु:खी हैं । ८४ लाख योनियों में घूम रहें हैं ।
वेदव्यास जी ने कहा है- भगवान से किसी भी जीव का अंधकार न गया है , न जाएगा ।
अत: हमारे स्वार्थ के दृष्टिकोण से गुरू का स्थान ऊँचा है । क्योंकि गुरू ने हीं हमें तत्त्व ज्ञान प्रदान किया । प्रैक्टिकल साधना करवाई । साधना के बीच जो जो बाधाएँ- शंकाएँ आई , उनका समाधान किया और साधना द्वारा अंत:करण शुद्ध करके हमें दिव्य प्रेम प्रदान किया । उसके बाद हमें भगवान के गोद में बिठा दिया । अत: साधकों के लिए गुरू तत्त्व हीं परतत्त्व हैं । - पुज्यनियां मां श्री रासेश्वरी देवी जी ।

Jagadguru

💞❣️🥀💚..(जगद्गुरु परिचय)... हमारे श्री महाराज जी कौन  हैं ?

"भक्ति की अंतिम परिणति का नाम महाभाव और महाभाव का मूर्तिमान विग्रह हैं श्री राधा। श्री कृष्ण रसिक शिरोमणि हैं,सम्पूर्ण अलौकिक रसों की निधि हैं। भक्ति और रस दोनों का अपूर्व सम्मिश्रण हैं ये 'कृपालु'।"

बात 14 जनवरी 1957, की है। काशी के मूर्धन्य,शास्त्रज्ञ विद्वानों की सभा तथा उपस्थित विशाल जनसमूह,इनके मध्य एक तेजस्वी युवक उपस्थित हुए.....जिनकी आयु लगभग 34 वर्ष की होगी। उन्होने अपनी अलौकिक वाणी और प्रतिभा से सभी को मंत्र-मुग्ध कर दिया। गौर वर्ण,काले घुंघरारे बाल,बिजली के समान चमकता शरीर,प्रेम रस परिप्लुत सजल नेत्र,सभी का चित्त आकर्षित हो गया। सब कुछ भूल कर एकटक सब इनकी और देखते रह गये। कौन हैं ये? इनके रोम-रोम से प्रेम निर्झरित हो रहा है। इनको देखते रहो,देखते रहो,नेत्रों की तृप्ति नहीं होती बल्कि वे और अधिक प्यासे हो जाते हैं। उनके कठिन वैदिक संस्कृत में दिये गये 9 दिन के विलक्षण प्रवचन को सुनकर विद्वत समाज के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। सभी के मन में जिज्ञासा हुई,'ये कौन है?' इनके ज्ञान को देखकर लगता है यह कोई अवतारी महापुरुष हैं अथवा इन्होनें कायाकल्प किया हुआ है,क्योंकि इतना अधिक ज्ञान तो हजारों वर्षों के अध्ययन के पश्चात भी संभव नहीं हैं। और शास्त्रज्ञ ही नहीं,ये तो भक्ति का मूर्तिमान स्वरूप प्रतीत होते हैं। सबके मानस पटल पर प्रश्नचिन्ह अंकित हो गया 'ये कौन हैं?'

ऐसा पहले कभी नहीं सुना,कभी नहीं देखा। सब एक दूसरे से पूछने लगे - क्या आप इनको जानते हैं? जिला प्रतापगढ़ से आए हनुमान प्रसाद महाबनी जी ने जो इन युवक के साथ आये थे,सबकी जिज्ञासा को शांत करते हुए बताया 'अधिक तो मैं भी इनके विषय में नहीं बता सकता,मुझे तो मालूम ही नहीं था कि इनके अंदर ज्ञान का अगाध समुद्र छिपा हुआ है। मेरे पास तो ये पिछले कुछ वर्षों से आते हैं,मैंने कल्पना भी नहीं की थी की ये वैदिक संस्कृत में पारंगत हैं। कब,कहाँ शास्त्रों वेदों का अध्ययन किया यह मेरे लिए भी प्रश्न बन गया है,कभी कोई शास्त्र वेद की पुस्तक इनको पढ़ते हुए नहीं देखा। रामायण,भागवत,गीता कुछ भी कभी इनके पास कभी नहीं देखा। ये तो अपने पास कोई सामान भी नहीं रखते हैं,यहाँ तक की पहनने के कपड़े तक भी साथ लेकर नहीं चलते,जिसके घर जाते हैं उसी के कपड़े पहन लेते हैं और अपने कपड़े वहाँ छोड़ देते हैं।
मैं तो यही समझता था कि यह संकीर्तन प्रेमी कोई रसिक हैं। मैंने कितनी बार इनको रोते,तड़पते,बिलखते देखा है। पूरी-पूरी रात ...हा कृष्ण! हा कृष्ण! कभी हा राधे! कहते हुए जमीन पर लोटने लगते हैं। श्यामा जू! राधे जू!!! कभी दीवारों का आलिंगन करने के लिए दौड़ते हैं,तो कभी वृक्षों से लिपट जाते हैं। नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होती रहती है, मानों नेत्र वर्षा ऋतु बन गए हों। शरीर की कोई सुधि-बुधि नहीं रहती,बेसुध हो जाते हैं।घंटों घंटों मूर्छित रहते हैं। थोड़ी सी चेतना आती है,पुन: फिर पृथ्वी पर लोटने लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है,इनको अहसाय वेदना हो रही है।
अश्रु ,स्वेद,रोमांच,कंप,विवर्णता,सभी सात्विक भाव इनके अंदर प्रकट हुए देखके तो मुझे अनेक बार लगा कि ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। आज समस्त शास्त्रों - वेदों के अलौकिक ज्ञान को देखकर मैं भी आश्चर्य चकित हूँ। मेरा तो इनके प्रति वात्सल्य भाव रहा है,जब इनहोने कहा कि मैं जगद्गुरु बनने जा रहा हूँ तो मैंने इनसे कहा,'जा जा शीशे में अपना मुह देख ले,कहीं ऐसा न हो मेरी नाक काटा दे'। लेकिन आज इनकी दिव्य वाणी को सुनकर काशी जो विश्व का गुरुकुल है,यहाँ के सभी विद्वान नतमस्तक हो गए हैं। मैं यही सोच रहा हूँ कि क्या ये वही युवक हैं जो मेरे पास रहकर संकीर्तन द्वारा प्रेम सुधारस का पान सभी भावुक भक्तों को कराते थे , या कोई और। मैं यही सोच रहा हूँ ये कौन हैं??????

ये कौन हैं?पश्चात समस्त विद्वानों ने एकमत होकर आपको "जगद्गुरूत्तम " की उपाधि से विभूषित किया।

उन्होने स्वीकार किया कि चारों जगद्गुरुओं के सिद्धांतों का समन्वय करने वाला यह कोई अवतारी पुरुष ही है,इतनी अल्पायु में इतना अधिक ज्ञान साधारण प्रतिभा से असंभव है।
लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व अद्वैतवादी जगद्गुरु श्री शंकराचार्य,

लगभग आठवीं नवीं शताब्दी में द्वैतवादी जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य,

12वीं शताब्दी में विशिष्टाद्वैतवादी जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य

एवं लगभग14वीं शताब्दी में द्वैतवादी जगद्गुरु श्री माध्वाचार्य हुए। सभी के सिद्धान्तों में थोड़ा-थोड़ा मतभेद रहा है,वह भले ही देश काल-परिस्थिति के कारण रहा है।

जगद्गुरु श्री शंकराचार्य का सिद्धान्त बिलकुल अलग है और तीनों जगद्गुरुओं के सिद्धांतों से।

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज के श्रीमुख से सभी जगद्गुरुओं के सिद्धान्तों का वेद,शास्त्र सम्मत समन्वय सुनकर काशी के विद्वान विस्मय से अभिभूत हो नतमस्तक हो गये। अत: उन सबने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की कि श्री कृपालुजी जगद्गुरुओं में भी सर्वोत्तम हैं।

श्री कृपालुजी महाराज भारत में सर्वाधिक उल्लसित प्रज्ञा से सम्पन्न हैं।
आपने उज्ज्वल भक्तियोगसम्पन्न 'भक्तियोग मण्डल' की स्थापना की है। धर्म के उद्धार की आपकी प्रबल भावना ,आपकी कीर्ति के साथ-साथ प्रतिदिन बढ़ रही है। आप धन्य हैं। आपको सर्वोत्तम जगद्गुरु की पदवी से विभूषित कियाजा रहा है।

समस्त शास्त्रों,वेदों,पुराणों तथा अन्य धर्म ग्रन्थों के असाधारण अलौकिक ज्ञान से युक्त कठिन संस्कृत में दिये गए वक्तव्य से तो सब नतमस्तक हो ही गये उनकी दिव्यातिदिव्य देह कांति से निर्झरित भक्ति पीयूष धारा ने सभी विद्वानों को यह स्वीकार करने के लिये बाध्य कर दिया कि ये 'भक्तियोग रसावतार' हैं।

उपस्थित विद्वत जनों ने ये अनुभव किया कि इनके रोम-रोम से भक्ति महादेवी का प्राकट्य हो रहा है।
ये स्वयं ही"रसो वै स: रसहयोवायम लब्धवाssनंदी भवति"। इस वेदवाणी का क्रियात्मक रूप हैं। ये रस और रसिकदोनों प्रतीत होते हैं।

ये कौन हैं?इनकी उपस्थिती ही अनुपम रस धारा प्रवाहित कर रही है,सबके हृदय में अपार उल्लास का संचार हो रहा है मानो राधाकृष्ण - भक्ति मूर्तिमान हो गयी है। भक्ति की अंतिम परिणति का नाम महाभाव और महाभाव का मूर्तिमान विग्रह हैं श्री राधा। श्री कृष्ण रसिक शिरोमणि हैं,सम्पूर्ण अलौकिक रसों की निधि हैं। भक्ति और रस दोनों का अपूर्व सम्मिश्रण हैं ये 'कृपालु'।

अत: राधाकृष्ण दोनों के ही सौन्दर्य रूपी अमृत के भंडार रसिकों के शिरोमणि ,प्रेम के साक्षात स्वरूप जगद्गुरु कृपालु जीवेदज्ञ,शास्त्रज्ञ तो हैं ही,ये भक्तियोगरसावतारभी हैं।

श्री राधाकृष्ण भक्ति का मूर्तिमान स्वरूप हैं। इतना ही नहीं उन विद्वानों ने महाप्रभु के अनुभवात्मक दिव्य ज्ञान व भक्ति रस से ओत-प्रोत व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अन्य बहुत सी उपाधियाँ भी प्रदान की।

सन 1956 में कानपुर में आयोजित विराट संत सम्मेलन में उपस्थित काशी के प्रख्यात पंडित शास्त्रार्थ महाविद्यालय के संस्थापक शास्त्रार्थ महारथी सर्वमान्य एवं अग्रगण्य दार्शनिक काशी विद्वत परिषत के प्रधान आचार्य श्री राजनारायण जी शुक्ल षटशास्त्री ने सार्वजनिक रूप से काशी आने का निमंत्रण देकर जो घोषणा की थी उसका अंश इस प्रकार है।

1-(कानपुर 19 अक्टूबर1956) ........"काशी के पंडित आसानी से किसी को समस्त शास्त्रों का विद्वान स्वीकार नहीं करते। हम लोग तो पहले शास्त्रार्थ करने के लिए ललकारते हैं। हम उसे हर प्रकार से कसौटी पर कसते हैं और तब उसे शास्त्रज्ञ स्वीकार करते हैं। हम आज इस मंच से विशाल विद्वन्मंडल को यह बताना चाहते हैं कि हमने संताग्रगण्य श्री कृपालुजी महाराज की भगवतदत्त प्रतिभा को पहचाना है और हम आपको सलाह देना चाहतेहैं कि आप भी उनको पहचानें,और इनसे लाभ उठाएँ।

आप लोगों के लिए यह परम सौभाग्य की बात है कि ऐसेदिव्य वाङ्मय को उपस्थित करने वाले एक संत आपके बीच आए हैं। काशी समस्त विश्व का गुरुकुल है। हमउसी काशी के निवासी यहाँ बैठे हुए हैं,कल श्री कृपालुजी महाराज के अलौकिक वक्तव्य को सुनकर हम सब नतमस्तक हो गये।
हम चाहते हैं कि लोग श्री कृपालुजी महाराज को समझें और इनके संपर्क में आकर इनके सरल,सरस,अनुभूत एवं विलक्षण उपदेशों को सुनें तथा अपने जीवन में उसे क्रियात्मक रूप से उतार कर अपना कल्याण करें।"

ये कौन हैं ये तो वे ही जानें। जिनकी कृपा से निमिष मात्र में जीव को अपना परम चरम लक्ष्य प्राप्त हो जाये ऐसे महापुरुष के जीवन व दिव्य कार्यों का आकलन उन्हीं कि कक्षा का कोई महापुरुषही कर सकता है।

2- लेकिन इतना अवश्य है कि जब कोई संगीतज्ञ श्री महाराजजी के दर्शन करता है और उनकी स्वरलहरी का रसास्वादन करता है तो यही कहता है इनके जैसा कोई गा नहीं सकता। इनका स्वर कहाँ से प्रकट हो रहा है। इतनी मादकता एवं मधुरता है कि बेसुध सा कर देती है इनकी स्वर लहरी।

3- कोई कवि देखता है तो दाँतों तले अंगुली दबाता है कि ऐसी काव्य प्रतिभा तो हो ही नहीं सकती किसी मनुष्य की। एक ही भावको हजारों रूप से प्रकट करने की शक्ति किसी अलौकिक प्रतिभा द्वारा ही संभव है।

किसी भी छंद में कोई भी पद चल रहा हो,श्यामा-श्यामके नित्य नवायमान स्वरूप का रसास्वादन करते हुए उनके श्री मुख से जब संकीर्तन की नित्य नव-नव पंक्तियाँ प्रस्फुट्टित होती हैं तो पाषाण हृदय व्यक्ति भी रस में निमज्जित हो युगल प्रेम याचना करने लगता है।

4- उस वाणी का वास्तविक रसास्वादन तो कोई रसिक ही कर सकता है।

5- जब आचार्य श्री ,श्री राधा रानी का निरूपण करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्री श्याम गौर सरकार का रसास्वादन कर रहे हैं,जब वे श्री कृष्ण का निरूपण करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि गौर सरकार,श्याम सरकार की सुधा-माधुरी का पान कर रही हैं।

6- अत: इन्हें गौर श्याम सरकार का मिलितवपु कहा जाये या गौरांग कहा जाये कोई रसिक ही निर्णय ले सकता है।

7- विद्वत्ता के विषय में तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है,सम्पूर्ण विश्व जानता है कि आज उनके जैसा कोई विद्वान नहीं है,उनके विलक्षण दार्शनिक प्रवचन ही इस बात का प्रमाण हैं।

राधे राधे।🙏🙏

Thursday, 16 April 2020

Krishna and Karna conversation

In Mahabharat, Karna asks Lord Krishna - "My mother left me the moment I was born. Is it my fault I was born an illegitimate child?

I did not get the education from Dhronacharya because I was considered not a Kshatriya.

Parsuraam taught me but then gave me the curse to forget everything when he came to know I was  Son of Kunthi belong to Kshatriya.

A cow was accidentally hit by my arrow & its owner cursed me for no fault of mine.

I was disgraced in Draupadi's Swayamvar.

Even Kunthi finally told me the truth only to save her other sons.

Whatever I received was through Duryodhana's charity.

So how am I wrong in taking his side ???"

**Lord Krishna replies, "Karna, I was born in a jail.

Death was waiting for me even before my birth.

The night I was born I was separated from my birth parents.

From childhood, you grew up hearing the noise of swords, chariots, horses, bow, and arrows. I got only cow herd's shed, dung, and multiple attempts on my life even before I could walk!

No Army, No Education. I could hear people saying I am the reason for all their problems.

When all of you were being appreciated for your valour by your teachers I had not even received any education. I joined Gurukula of Rishi Sandipani only at the age of 16!

You are married to a girl of your choice. I didn't get the girl I loved & rather ended up marrying those who wanted me or the ones I rescued from demons.

I had to move my whole community from the banks of Yamuna to far off Sea shore to save them from Jarasandh. I was called a coward for running away!!

If Duryodhana wins the war you will get a lot of credit. What do I get if Dharmaraja wins the war? Only the blame for the war and all related problems...

Remember one thing, Karna. Everybody has Challenges in life to face.

LIFE IS NOT FAIR & EASY ON ANYBODY!!!

But what is Right (Dharma) is known to your Mind (conscience). No matter how much unfairness we got, how many times we were Disgraced, how many times we Fall, what is important is how you REACTED at that time.

Life's unfairness does not give you license to walk the wrong path...

Always remember, Life may be tough at few points, but DESTINY is not created by the SHOES we wear but by the STEPS we take...

#Collected

How Rape started in India

भारत में बलात्कार का आरंभ और यौन अपराध..
इस्लाम की देन !!
मुझे पता है 90 % बिना पढ़े ही निकल लेंगे..

आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी ?

आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का उल्लेख नहीं है ?

तब आखिर ऐसा क्या हो गया ?.. कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है ??

श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया।

महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक न लगाया ।

अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में - 

220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक "डेमेट्रियस प्रथम" ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।

इसके बाद "युक्रेटीदस" भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने "तक्षशिला" को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।

डेमेट्रियस के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक "वृहद्रथ" को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

सिकंदर ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए लेकिन यहां भी परस्त्रीहरण का कोई उदाहरण नहीं मिलता।

इसके बाद शकों ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। सिन्ध नदी के तट पर स्थित मीननगर को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।

इसके बाद तिब्बत के "युइशि" (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति "कुषाणों" ने काबुल और कंधार पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें "कनिष्क प्रथम" (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ।जिसका राज्य कश्मीर से उत्तरी सिन्ध तथा पेशावर से सारनाथ के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।
इसके बाद अफगानिस्तान से होते हुए भारत तक आये हूणों ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।
इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे नेपालवंशी शक्य आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।

अब आते हैं मध्यकालीन भारत में -

जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण -

और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन !!

सबसे पहले 711 ईस्वी में "मुहम्मद बिन कासिम" ने सिंध पर हमला करके राजा दाहिर को हराने के बाद उसकी दोनों बेटियों को "यौनदासियों" के रूप में "खलीफा" को तोहफे में दे दिया। 

तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें हारे हुए राजा की बेटियों और साधारण भारतीय स्त्रियों का जीती हुयी इस्लामी सेना द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।

फिर आया 1001 इस्वी में "गजनवी"। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने इस्लाम को फ़ैलाने के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था। 

सोमनाथ के मंदिर को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों "काफिर" औरतों का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर "बाजारों में बोलियाँ" लगाकर "जानवरों" की तरह "बेच" दिया ।

फिर "गौरी" ने 1192 में "पृथ्वीराज चौहान" को हराने के बाद भारत में "इस्लाम का प्रकाश" फैलाने के लिए "हजारों काफिरों" को मौत के घाट उतार दिया और उसकी "फौज" ने "अनगिनत हिन्दू स्त्रियों" के साथ बलात्कार कर उनका "धर्म-परिवर्तन" करवाया।

ये विदेशी मुस्लिम अपने साथ औरतों को लेकर नहीं आए थे।

मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर, और अपने हरम में 8000 रखैलें रखने वाला तथाकथित lover-boy शाहजहाँ।

इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए "मीना बाजार" लगवाने वाला "जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर"।

मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों "काफिर महिलाओं" "(माल-ए-गनीमत)" का बेरहमी से बलात्कार किया और "जेहाद के इनाम" के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह "सिपहसालारों" में बांटा तो कभी बाजारों में "जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी" गई। 

ये असहाय और बेबस महिलाएं "हरमों" से लेकर "वेश्यालयों" तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।

एकबार फिर से बता दूँ कि मुस्लिम "आक्रमणकारी" अपने साथ "औरतों" को लेकर नहीं आए थे।

वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा "पराजित काफिर स्त्रियों का बलात्कार" करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे "अपनी जीत" या "जिहाद का इनाम" (माल-ए-गनीमत) मानते थे। 
केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा। 

बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया।

गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए "दिल दहला" देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ।

इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं। 

इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया। 

ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली प्रकृति-पुत्री भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।

महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते। 

1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्टर एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों काफिर महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं।
     नवंबर 1947 मे मेरे मीरपुर पर मुसलमानों ने हमला कर हिन्दूओ व सिक्खो का कत्लेआम करने के बाद  10 साल से  40 साल की औरतों को बंदी बनाकर पाकिस्तान ले जाकर  नीलाम किया गया ।

इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि "पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों" से "बलात्कार" किये बिना एक भी "काफिर स्त्री" वहां से वापस नहीं आ सकती थी।

जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आ भी गयीं वो अपनी जांच करवाने से डरती थी।

जब डॉक्टर पूछते क्यों तब ज्यादातर महिलाओं का एक ही जवाब होता था कि "हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं ये हमें भी पता नहीं"।

विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की "नग्न यात्राएं (धिंड) "निकाली गयीं, "बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं" अर्थात हमारी देवियां और इस दुर्दांत कौम के लिए कमोडिटी !!

और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।

20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया। (देखें फिल्म "पिंजर" और पढ़ें पूरा सच्चा इतिहास गूगल पर)।

इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे। 

वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके "स्तनों को काटकर" तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।

अंत में कश्मीर की बात -

19 जनवरी 1990 -

सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था - "या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन.. अपनी औरतों को यहीं छोड़कर "। 

लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं। 

वह कहते हैं कि "मस्जिदों के लाउडस्पीकर" लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा, "निजाम-ए-मुस्तफा", 'आजादी का मतलब क्या "ला इलाहा इलल्लाह", 'कश्मीर में अगर रहना है, "अल्लाह-ओ-अकबर" कहना है।

और 'असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ "रोअस ते बतानेव सान" जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ।

सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे।

सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये। 

उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके "नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया"। 

कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से दाग-दाग कर मार दिया गया। 

कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्टजो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर हाथों और लातों से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी गयी।

कुछ वर्षों से कुछ महीनों तक की उम्र के बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से पेड़ों पर लटका फाँसी दे कर मार दिया गया।

कश्मीरी काफिर महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी।

लेखक राहुल पंडिता उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, 'मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो'।

राहुल पंडिता के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं, "कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं।

1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था- 'हम सब एक, तुम भागो या मरो'। 

घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।

कुल मिलाकर हजारों की संख्या में काफिर महिलाओं का बलात्कार किया गया.. पच्चास-पच्चास मुस्लिमों द्वारा..
उनके पिताओं.. उनके भाइयों.. पतियों के सामने !!

आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल इसलिए नोच-नोच कर खा लिया गया कि वे हिन्दू थीं।

घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे कि धूप-दीप और हवन से सुवासित होने वाले दीवारो-दर आज बकरीद के खून के छींटों से दगे पड़े हैं। झेलम और वितस्ता का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए।

लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों को अपने कंधों पर बिठाया और उनके ही लश्कर में शामिल हो दसियों साल से "गंगा-जमुनी तहजीब" के नशे में डूबे हिन्दुओं को जी भर-भर लूटा !!

अभी हाल में ही आपलोगों ने टीवी पर "अबू बकर अल बगदादी" के जेहादियों को काफिर "यजीदी महिलाओं" को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।

पाकिस्तान में बकरियों की तरह खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा। 

बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों मार्मिक घटनाएँ सुनी होंगी। 

यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा।

केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में आदम हवस से बजबजाती इस घिनौनी सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया। 

परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी...
बलात्कार के रूप में ।

आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद और नराधमों के अनवरत कुसंग के चलते समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी।

जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिक रूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी.. दुधमुंही.. देवी जैसी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप हमें देखने को मिल रहा है। शेयर जरूर करें!!
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Wednesday, 15 April 2020

Jagadguru Kripalu Ji Maharaj

प्रश्न :- महाराज जी ! साधना में कैसे आगे बढ़ें ?

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा उत्तर :-

मन ने हमारे अनन्त जन्म बरबाद किये । अब मन कर रहा है ऐसा करें , बस हो गया । देखो यहाँ जितने लोग उठते हैं सबेरे तीन बजें , साढे़ तीन बजे और कीर्तन करते हैं , ये अपने घर जाकर तीन बजे उठते है क्या ? कितने आदमी उठते हैं । और जो नहीं उठते हैं वो क्यों नहीं उठते ? मन के गुलाम । अरे , अकेले ही तुम अपना भगवान् का ध्यान करो या इतनी सारी पुस्तकें हमने बना दी हैं पढ़ो । मन को लगाओ भगवान् में , किसी प्रकार से लगाओ । नहीं जी अब मन कह रहा है सोओ , कोई महाराज जी थोड़े ही हैं डाँटेंगे । सो रहे हैं अपना छः बजे उठे , सात बजे उठे । तमोगुण में सुख मिलता है । पढाई और साधना एक बात है । जैसे बड़े - बड़े आदमियों के लडके अरबपतियों के लड़के , प्राइममिनिस्टर के लड़के भी परीक्षा के लिये पढ़ते हैं । जागते है रात - रात भर । अगर वो मन के बहकावे में आ जायें - अरे चलो सोओ , हटाओ , जो होगा देखा जायेगा । तो देखा क्या जायेगा , फेल हो जाओगे । और क्या देखा जायेगा । जितने स्वाश बचे हैं मृत्यु के पहले वाले उनको काम में लेना चाहिये । चाहे हजार लोग बैठे हो हम स्वाश स्वाश से राधे - राधे बोलें । कौन क्या जानेगा क्या कर रहे है हम । ये अवसर फिर नहीं मिलेगा । मनुष्य का शरीर ,भारतवर्ष में जन्म और तत्त्वदर्शी का मिलना , तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेना , सब बनाव तो बन गया और अब कौन सी कृपा बाकी है भगवान् की । अब तो तुम्हारी कृपा आवश्यक है । भगवान् की तो सब हो गई । लापरवाही बस और कुछ बात नहीं । यें लापरवाही जो मैं शब्द बोल रहा हूँ , उसको सोचो ,बार - बार । इसमें पच्चीसो बीमार हैं किसी की कमर ख़राब , किसी का पैर खराब ,किसी का कुछ खराब लेकिन जब मन को डाँट करके लगाते हैं आप लोग तो आँखों में आसूँ भी आ रहे है कीर्तन भी हो रहा है । और अगर ये सब न करो , न हो , महाराज जी भी न हो सत्संग भवन में और आप कमरे में अपने बैठे हों , अरे सर दर्द हो रहा है , अरे लेट जायें , लेट गये , फिर सो गये । क्या मिला ? मन के गुलाम । सब उत्थान और पतन का कारण मन है । केवल मन । इसी मन को जिसने दुश्मन मान लिया और उसके ऊपर लगाम कस ली , वो महापुरूष हो गया । और क्या है महापुरूषों के पास । वही हाथ , पैर ,नाक , कान , आँखे उनके भी है हमारे भी है । उन्होंने प्रतिज्ञा कर लिया ,मैं जो कहूँगा वो होगा और मैं वही कहूँगा जो गुरु ने बताया है । उसके अनुसार मन को गवर्न करूँगा । बस । अभ्यास कर ले कुछ दिन जबरदस्ती , उसके बाद आदत पड़ जायेगी । पहले शौक से कोई व्यक्ति शराब पीता है , कोई व्यक्ति सिगरेट पीता है । ऐसा नहीं होता कि एकदम से हमारी प्यास हो गई शराब की कि शराब लाओ । ऐसा कहीं विश्व में हुआ है ? पहले कुसंग से अपने साथियों के कहने से और ऐसे ही शौक से पिया कि देखें तो , क्या बात है शराब में , सब बड़े - बड़े लोग उसके चक्कर में पड़े है । जिनके पास तमाम वैभव है । उसमें सुख नहीं मिलता उनको तभी तो , शराब पीते होंगे । डेली , शराब पी के लोग सोते हैं बड़े - बड़े अरबपति । बस एक बार पिया , तो शराब का तो अपना काम है नशा करना , बस उसी को आनन्द मान लिया । और रोज पीने लगा , फिर पियक्कड़ हो गया ।

तो संसार में भी सब काम पहले बेमनी से करते हैं । फिर आदत पड़ जाती है । ऐसे ही पहले जबरदस्ती मन को रोको ,गलत चिन्तन न करें , एक सैकिण्ड भी खराब न होने दे । और उसके लिये पच्चीसों साधन हैं । हरि गुरु का चिन्तन ; चिन्तन से थक गये तो पठन । एक - एक विषय पर सैकड़ों , हजारों पद हमने लिख दिये हैं ,बना दिये हैं । एक को पढो , गाओ । फिर बोर हो गये , दूसरा उठाओ , तीसरा उठाओ ,लापरवाही छोड़ो ।

पुस्तक :- प्रश्नोत्तरी ( भाग ३ )
पृष्ठ संख्या :- ७८ , ७९ एवं ८०(प्रश्न:३२).

#जगद्गुरु_श्री_कृपालु_जी_महाराज।

Thursday, 9 April 2020

International Diplomacy

*"Will Not Be Forgotten": Trump Thanks India For Allowing Key Drug Export*

*Brazil* thanks India. 
*America* thanks India.
*Sri Lanka* thanks India. 
*The world* thanks India.
*And the leadership it offers to the world...*

This is the *‘New India’* created by a vision of our Prime Minister Shri Narendra Modi 
*Aren’t we all proud to be an Indian? 🇮🇳 Jai Hind!*

*US President Donald Trump* on Wednesday thanked India for its decision to export anti-malaria drug hydroxychloroquine to assist in his country’s fight against novel coronavirus.

*“Extraordinary times require even closer cooperation between friends. Thank you India and the Indian people for the decision on HCQ. Will not be forgotten! Thank you Prime Minister @NarendraModi for your strong leadership in helping not just India, but humanity, in this fight!”* he tweeted.

Earlier, Trump had told Fox News, *“I spoke to PM Modi, a lot of it (hydroxychloroquine) comes out of India. I asked him if he would release it? He was great. He was really good. You know they put a stop because they wanted it for India....”* He said India would get the novel coronavirus vaccine (as and when it is developed in the US) ahead of others as it had helped US with HCQ tablets.

Wednesday, 8 April 2020

Maa Raseshwari Devi

श्रीराधाभावमयी भक्ति में जीव का अधिकार नहीं है। श्रीराधा तो महाभाव स्वरूपा श्री कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति हैं । फिर तटस्था शक्ति जीव किस प्रकार की भक्ति का अधिकारी है?  उसे श्रीराधाभाव की अनुगत्यमयी सेवा का अधिकार प्राप्त है । जीव श्रीकृष्ण का नित्य दास है। दास का कभी स्वतंत्र सेवा में अधिकार नहीं हो सकता । श्रीराधा एवं ब्रजगोपीगण की श्रीकृष्ण सेवा स्वातंत्र्यमयी है । उनकी भाँति श्रीकृष्ण की स्वातंत्र्यमयी  सेवा में जीव का अधिकार कदापि नहीं है । वह तो बस इनकी अनुगता दासी रूप में इनकी श्रीकृष्ण प्रीति विधानोपयोगी लीला में अनुकूलता हेतु तत्पर रहकर श्रीकृष्ण सेवा कर सकता है ।

 इस अनुगत्यमयी सेवा में जो सुख है, वह अतुलनीय है। रहस्य की बात यह है कि श्री ब्रजसुंदरीगण श्रीकृष्ण मिलन में जो सुख प्राप्त करती है, उससे भी कई गुनाधिक सुख आनुगत्यमयी सेवा में प्राप्त होता है । इस प्रेमा भक्ति की एक विशेषता यह भी है कि इसमें ऐश्वर्यज्ञान का सर्वथा अभाव पाया जाता है । 
चूंँकि ऐश्वर्यज्ञान से प्रीति शिथिल हो जाती है, अंत: ब्रजसुंदरीगण की रागात्मिका भक्ति में ऐश्वर्यज्ञान किंचित भी नहीं है । ऐश्वर्यज्ञान मिश्रित प्रीति या भक्ति से चारों प्रकार की मुक्तियांँ  तो प्राप्त हो सकती है, परंतु ब्रजभाव की सेवा नहीं  । प्रेमाभक्ति में परम निष्कामता है, आत्मसुख की गंधमात्र भी नहीं है । केवल श्रीकृष्ण सुख संपादन करना ही इसका तात्पर्य है।

 इसी ब्रजभाव की श्री कृष्णसुखैकतात्पर्यमयी सेवा के आदर्श स्थापन तथा शिक्षार्थ स्वयं ब्रजेन्द्रनंदन श्रीकृष्ण, चैतन्य के रूप में जीवों को शिक्षा प्रदान करने के लिए भक्ति का आचरण करके दिखा रहे हैं , ताकि इस सर्वोत्कृष्ट भक्ति की शिक्षा सम्यक् प्रकार से प्रदान की जा सके । यहां उनके स्वयं अवतरण का कारण यह है कि युगधर्म श्रीकृष्ण-नाम-संकीर्तन का प्रचार तो अंशावतार अथवा युगावतार द्वारा ही हो सकता है , परंतु ब्रजप्रेम केवल स्वयं भगवान श्री कृष्ण प्रदान कर सकते हैं । जिस ब्रजप्रेम एवं आनुगत्यमयी भक्ति को प्रदान करने के लिए स्वयं श्रीकृष्ण श्रीकृष्णचैतन्य रूप से नवदीप में अवतीर्ण हुए थे , उसी परम दुर्लभ प्रेमाभक्ति को वर्तमान युग में श्री कृपालु जी महाराज प्रदान कर रहे हैं।
-पुज्यनियां रासेश्वरी देवी जी ।

Jagadguru

*जगद्गुरुत्तम संदेश*

*( हमेशा याद रखें यह सिद्धान्त ) :-🙏

*द्वेष करने वाले व्यक्ति के प्रति भी द्वेष न करें | उदासीन रहे |

*आज कोई नास्तिक भी है तो कल उच्च साधक बन सकता है अत: साधक यह न सोचे कि इसका पतन सदा को हो चुका | सूरदास संत उदाहरण हैं |

*गुरु की सेवा करने वाला तो साधक ही है, उसके प्रिय होने के कारण उस से द्वेष करना पाप है |

*सचमुच भी कोई अपराधी हो तो भी मन से भी' उसके भूतपूर्व अपराधों को न सोचे , न बोलें |

*संसार में भगवत्प्राप्ति के पूर्व सभी अपराधी हैं |
 
*बड़े बड़े साधकों का पतन एवं बड़े-बड़े पापियों का भी उत्थान एक क्षण में हो सकता है |

*सब में श्री कृष्ण का निवास है अत: उनको ही महसूस करें | 

*मन को सदा श्री कृष्ण एवं उनके नाम , रुप , गुण , लीला , धाम, तथा उनके स्वजन में ही रखना है |

*अपने शरण्य ( हरि एवं गुरु ) को सदा अपने साथ रक्षक रुप में मानना है |

*परदोष दर्शनादि कुसंगों से बचना है |

*दोष चिन्तन करते हुए शनै-शनै बुद्धि भी दोषयुक्त हो जाती है |

*परदोष दर्शन ही स्वयं के सदोष होने का पक्का प्रमाण है l
*हमारा निन्दक हमारा हितैषी है |

*निन्दनीय के प्रति भी दुर्भावना न होने पाये क्योंकि उसके हृदय में भी तो श्री कृष्ण हैं |

*कम बोलो मीठा बोलो |

*निरर्थक बात न करो | काम की बात करो |

*प्रतिदिन सोते समय सोचो आज हमने कितनी बार ऐसे अपराध किये |

*कम दोस्ती रखो | कम लोगों से मिलो | कम लोगों से बात करो |

*बहुत संभल के संयम के साथ वाणी का प्रयोग करो |

*किसी का अपमान न करो | कड़क न बोलो | किसी को दु:खी न करो |

*सबसे बड़ा पाप कहा गया, दूसरे को दु:खी करना |

*सहनशीलता बढ़ाओ, नम्रता बढ़ाओ , दीनता बढ़ाओ |

*मौत को हर समय याद रखो | पता नहीं अगला क्षण मिले न मिले |

*सारे संसार में सब स्वार्थी हैं, किसी के धोखे में मत आना |

*मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है |

*संसार में कहीं राग भी न हो , द्वेष भी न हो , उसको वैराग्य कहते हैं |

*भक्त के लिय भगवान् का प्राण समर्पित है |

*वह दास नही जो भगवान से कुछ माँगे | वह तो व्यापारी है |

*दास माने क्या ? स्वामी की इच्छानुसार सेवा करे |

*सांसारिक कामना की पूर्ति के लिए कोई भी व्यक्ति झूठ बोलेगा , पाप करेगा , सब कुछ करता है |

*संसार की कामना के स्थान पर भगवान् की कामना बनाना है | बड़ी सीधी सी बात है उसी का नाम भक्ति है |

*संसार का वैभव पागल बना देता है | वो अकिंचन नहीं महसूस करता अपने आपको |

*भगवान् से प्रेम करना है तो संसार की कामना छोड़ना पड़ेगा |

*यदि भगवान् को सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ समझकर यह सब उन्ही पर छोड़ दिया जाय , तो माँगने की बीमारी ही उत्पन्न न होगी |

*जिस दिन किसी जीव को यह दृढ़ विश्वास हो जाएगा कि भगवान् और भगवान् का नाम एक ही है, तो उसी क्षण उसे भगवत्प्राप्ति हो जाएगी |

*भगवत्प्राप्ति केवल भगवत्कृपा से ही संभव है , अन्य कर्म , ज्ञानादि किसी भी साधन से असम्भव है |

*भगवत्कृपा के हेतु अन्त:करण शुद्ध करना होगा |

*यह कार्य वास्तविक गुरु की सहायता से ही होगा |

*सब कुछ देकर भी न सोचो कि मैने कुछ दिया क्योंकि कोई भी प्रदत्त मायिक वस्तु दिव्य सामान का मूल्य नहीं हो सकती |

*संत और भगवान् दया के सिवाय और कुछ कर ही नहीं सकते |

*अपनी बुध्दि को संत की बुध्दि में जोड़ दो | बस पूर्ण शरणागति यही है |

*संसार में न सुख है न दु:ख हैं , हमारी मान्यता से सुख या दु:ख मिलता है |

*संसारी कामना ही दुखों का मूल है , क्योंकि कामना पूर्ति पर लोभ एवं अपूर्ति पर क्रोध बढ़ता है |

*केवल कान फुकवा लेने मात्र से अथवा गुरुजी के पैर दबाने मात्र से , अथवा गुरु जी को संसारिक द्रव्य देने मात्र से अथवा बातें बनाने मात्र से , शरणागति नहीं हो सकती |

*वास्तविक गुरु तत्त्वज्ञानी एवं भगवत्प्रेम प्राप्त होना चाहिए |

*मन से हरि गुरु में अनुराग करना एवं तन से संसार का कर्म करना ही कर्मयोग है |

*भक्ति के अनेक भेद हैं किन्तु श्रवण , कीर्तन , एवं स्मरण तीन ही प्रमुख है |

*सर्व प्रमुख स्मरण भक्ति ही है |
                          
*-- तुम्हारा कृपालु.....

Sunday, 5 April 2020

Fake News

The headlines 

A pregnant M@slim woman was refused treatment by a hindu doctor and she lost her baby and hence Hindus are bigots and m@slims are persecuted in India. If some 🤡 joker from abroad googles for such news this will be very prominent in google search as it has all the key words 

But what is reality ?
A m@slim lady went to a hosp in Bharatpur Rajasthan with delivery pains 
The doctors checked her, gave her injection and did a Ultrasound scan 
They found her 6.5 month foetus was not well in the womb 
It was her 7th delivery, hence they referred her to a bigger hosp in Jaipur 
The lady was accompanied by a female relative 
Both said doctors treated them well 
But her hubby didn’t take her to Jaipur. He made her walk and wait for ambulance for long time 
By the time ambulance comes she delivered a dead  baby 
Instantly the hubby made an allegation that his wife was denied Admission as she was a m@slim 
While the fact is he was not even accompanying the lady. 
And then a Rajasthan minister tweeted the incident which went viral as all liberals are looking at an incident where they can blame Hindus as they want some thing like this when Tabhlageejm@t is being talked all over the world 

The pre$&titute from India today doesn’t ask the doctors or the lady or the relative 
He just published what the hubby told as gospel truth with a religious headline 

And another important fact - there are 3 m@slim women who delivered babies in that hosp 🙈
Shoot these paid prostitutes  for fake news 

PM

*PM"का मजाक'*
लोग प्रधानमंत्री का मजाक उड़ा रहे हैं। *ठीक वैसे ही जैसे इटली के लोगों ने इटली के प्रधानमंत्री जुसेप कॉन्टे* का मजाक बनाया था। उनके होम क्वारन्टाइन के अपील की खुल के धज्जियां उड़ाई थीं। उससे क्या हुआ...? वो पी एम है। उनको कुछ नहीं होना। वो आज भी जिंदा हैं। सरकार में हैं। *मरे कौन...? किसकी जान गई? किन्होंने अपने प्यारों को खोया? कौन  अपने जान से प्यारे अपनों की अंतिम झलक भी न देख पाए? वहां इतने मरे हैं कि न गाड़ने के लिए ताबूत है न जलाने के लिए लकड़ी।*

   *सरकार का कुछ नहीं जाएगा। वो चाहे तो तमाम मौतों पर महामारी की मुहर लगाकर जस्टिफाई कर देगी। शुक्र मनाओ की तुम्हें एक ऐसा पी एम मिला है जो अपनी इकॉनमी को दांव पर लगाकर तुम्हारे जान की कीमत चुकाने को तैयार है। जिसने इस समय पहली प्राथमिकता सिर्फ हिंदुस्तानियों की प्राण रक्षा को फिक्स किया है। तुम्हारे लिए हर तीसरे-चौथे दिन किसी न किसी बहाने आ कर संवाद कर रहा है। तुम्हे प्रेरित कर रहा है, एक जुट कर रहा है, तुममें* आत्मविश्वास भरने की कोशिश कर रहा है।

*मैं रोज अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की स्पीच सुनता हूँ । एक कह रहा है कि मरने के लिए तैयार रहो। आनेवाले समय मे एक लाख मौतें होंगी। तो वहीं दूसरा उस से एक कदम आगे बढ़कर करांची में 80 एकड़ का कब्रगाह खुदवा रहा है ताकि कोरोना से मरनेवालों को गाड़ते जाए।ये दोनों रोज यही अंदाजा लगाते रहते हैं कि हमारे यहां कितने मरेंगे*।

*अब आप बुरा माने या भला, यह हिंदुस्तान की अच्छी किस्मत है कि इस संकट में यहां एक सचेत और लोगों की जान की कीमत जाननेवाला और हौसला बढ़ानेवाला पी एम मिला है। इस संकट की घड़ी में एकजुट हो जाइए और प्रधानमंत्री का साथ दीजिये। बच गए तो राजनीति होती रहेगी*। कोरोना की संक्रामक शक्ति देख रहे हैं न ? सोचिए अगर लॉक डाउन न होता तो अबतक क्या स्थिति होती! *इस रोग की मृत्यु दर भले कम हो पर संक्रमण बहुत-बहुत-बहुत ज्यादा है इतनी ज्यादा की पूरे देश को चपेट में ले ले। और अगर ऐसा हुआ तो कितने लोग निपट जाएंगे पता है न? 1% यहां 1.3 करोड़ होता है।*

Friday, 3 April 2020

Islam

Supposedly written by leftist Islamic scholar from JNU. Source may be verified. I disown any responsibility for the article. Those disagree may disbelieve/delete it.

The Tablighi Jamaat

By Khalid Umar

Some sections of the Indian society seem to be under the impression that The Tablighi Jamaat (Society of Preachers) is a small misguided faction of the Muslim diaspora in India. This impression is grossly misplaced.

The Tablighi Jamaat truly represents  ISLAM. If you want to know the real, basic, raw Islam, this is it.

It was founded by a Deobandi Islamic scholar Muhammad Ilyas al-Kandhlawi in Mewat, India, in 1926. 

His goal was to establish a group of dedicated preachers who could revive “true” Islam, which he saw was not being practised by many Muslims.

It spread fast. 

In its annual conference held in November 1941, some 25,000 people attended. 

After putting down strong roots in India, it grew rapidly across Pakistan, Afghanistan, Bangladesh, Sri Lanka, Malaysia and Indonesia. 

It is highly popular among Muslim minorities in the West, including America, England, and France. It has a firm foothold in parts of the Middle East as well. 

Its mass popularity across the ummah shows that its core thought resonates with the LCM (lower common denominator) of the Muslim thought. 

Whatever the problem, ‘Islam is the solution’ is their mantra. In their hands, Islam transforms from a personal faith into a ruling system that knows no constraints. 

They scrutinize the Koran and other texts for hints about Islamic medicine, Islamic economics, and Islamic statecraft, all with an eye to creating a total system for adherents and corresponding total power for leaders. 

Their core belief that Islam is a “total way of life,” I argue, tends to be by nature anti-democratic and aggressive, anti-semitic, and anti-Western. 

The West has unfortunately failed to understand that “Islam is not just a religion, it is a total way of life.”

It is argued by the liberals and the left that all religions imply a total way of life as they all try to define a believer’s most fundamental values to influence the family, the economy, and the polity. 

But Islam is different. It goes beyond indirect influences on behavior and provides an elaborate code of religious law that amounts to a blueprint for a specific social order through the statehood.

Tablighis urge fellow Muslims to live like the Prophet did. They insist on its members to dress like the Prophet did (trouser or robe should be above the ankle). 

Men usually shave their upper lip and keep long beards. The organisation has a loose structure. The Emir is the leader of the international movement and is always related to the group’s founder Muhammad Ilyas al-Kandhlawi. 

The current leader in India, Maulana Saad Kandhalvi, is the grandson of the founder. The group also has an advisory council with different national units and national headquarters.

While there is no formal process for membership of the Tablighi Jamaat nor is a member list maintained, many well-known people and popular personalities of India and the world have been associated with this Jamaat. 

Former President of India Zakir Hussain was associated with the Tablighi Jamaat. Former CM Punjab, Pakistan Parvez Elahi is a staunch supporter of Tablighi Jamaat. 

Maulana Tariq Jameel head of the Pakistani faction of the Tablighi Jamaat is close friends with Imran Khan as well the current Pakistani Army Chief General Qamar Bajwa.

The Tablighi take on Corona Pandemic is that Allah has created it to punish the humanity which has departed from the righteous path shown by Him through his prophet. 

Allah will protect the believers if they go back to His ways. 

With this core belief, the infected Tablighis have become the super-spreaders among the Kaafirs in India as well in Pakistan and the whole world.

They represent the fundamentals of Islam. Please take no chances with them, they would be deadly in these dreaded times.