°°°°°जगद्गुरु _ आदेश °°°°°°
_श्रीकृष्ण का माधुर्य भाव युक्त निष्काम प्रेम प्राप्त कर, उनकी नित्य सेवा ही तुम्हारा लक्ष्य है ।
_वह दिव्य निष्काम प्रेम, गुरु कृपा द्वारा अन्तः करण शुद्धि होने पर
ही प्राप्त होगा ।
_वह अन्तः करण शुद्धि,गुरु द्वारा निर्दिष्ट साधना द्वारा ही संभव है ।
_साधना_श्री राधा कृष्ण का रुपध्यान करते हुये ( स्वेच्छा से बनाये हुये रूप में दिव्य भावना रखना है ) रोकर नाम, गुण, लीलादि का संकिर्तन करो ।
_सदा श्रीकृष्ण को अपने साथ ही मानो ।
_मोक्ष पर्यन्त की कामना छोड़कर, केवल दिव्य शुद्ध प्रेम की कामना से ही प्रेम करो ।
_" वे ही मेरे हैं," इस भावना को निरंतर दृढ करो ।
एवं श्याम मिलन की परमव्याकुलता पैदा करो ।
_ परदोष दर्शनादि कुसंगों से बचो ।
मानव देह का प्रत्येक क्षण अमूल्य मानो ।
_________मैं सदा तुम्हारा सहायक हूँ ।__तुम्हारा कृपालु.. !
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