ऐसा हुआ था एक बार कि देवताओं और असुरों का युद्ध हुआ। तो बहुत असुर मारे गये। तो असुरों के गुरु शुक्राचार्य, उन्होंने कहा- ये तो बड़ा गड़बड़ हो गया। हमारे तो तमाम असुर मारे गये। अब तो देवता लोग हमेशा दबा लेंगे। तो वह गये तप करने कि ऐसी सिद्धि प्राप्त कर के आवें कि जितने मरे हैं सबको जीवित कर दें। तो देवताओं को खबर हुई। उन्होंने कहा ये तो बड़ी प्रॉब्लम खड़ी हो जायेगी। ये सब जिन्दा हो जायेंगे तो। तो उधर तो वो तप करने के लिये गये और उनके तप को भ्रष्ट करने के लिये इन्द्र ने अपनी लड़की भेज दी। और इधर बृहस्पति ने शुक्राचार्य का शरीर धारण कर लिया, शुक्राचार्य बन गये और असुरों में गये। असुरों ने नमस्ते किया। वह समझे कि हमारे गुरु जी हैं और उनको ये तत्त्वज्ञान बताया कि शरीर ही सब कुछ है। इसका सुख ही सब कुछ है। वह चार्वाक् सिद्धान्त हुआ। और उनसे ये भी कह दिया कि देखो एक देवता हमारा शरीर धारण करके आएगा, जब आवे तो उसको मार कर भगा देना। अब शुक्राचार्य की तपस्या को भंग कर दिया इन्द्र की लड़की ने। अब वो आये जब असुरों के पास तो उन्होंने कहा गेट आउट। दंग रह गये गुरु जी। क्या हो गया इन लोगों को। इतनी हमारी पूजा करते थे रोज। और आज ये हमारा अपमान कर रहे हैं। अरे! मैं शुक्राचार्य हूँ। हाँ हाँ, मालूम है, मालूम है। जाओ, जाओ नहीं पिट जाओगे अभी। वो बिचारे भाग आये। तो ये इसलिये बृहस्पति ने एक सिद्धान्त बनाया असुरों के लिये कि वह आगे स्प्रिचुअल पावर न पा सकें। इसी में लिप्त रहें, विषय भोग में।
अस्तु चार्वाक् का सिद्धान्त है अपने स्वार्थ मानव-शरीर के अर्थ तक सीमित रहो। वैसे तो सुनने में आप लोग सोचते होंगे बड़ा बेवकूफ था। बड़ा गलत सिद्धान्त है। लेकिन आज छह अरब आदमी में ६ लाख भी नहीं निकलेंगे ऐसे जो इस सिद्धान्त को प्रैक्टिकल मान लें। जैसे आपका अटैचमेन्ट माँ में है, बाप में है, भाई में है, परिवार में कहीं है? हाँ है। "तो_फिर_आप_चार्वाक्_से_नीचे_हैं।" चार्वाक् कहता है- केवल अपने शरीर तक रहो। माँ, बाप, भाई, बहन दुःखी हों, रोवें, गायें, मरें उसे मत सोचो। और आप तो और लोगों में अटैचमेन्ट किये बैठे हैं। केवल शरीर में अटैचमेन्ट रखना ये चार्वाक् सिद्धान्त है। तो यहाँ तक पहुँचे हुए कितने लोग हैं जो केवल शरीर तक अपने सीमित हों, न कहीं राग हो, न कहीं द्वेष हो। बस शरीर में ही राग, अटैचमेन्ट।
-जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु महाप्रभु जी के प्रवचन का अंश।
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