*एक बहुत बड़े फकीर हुये हैं- हजरत जुनैदो, बड़े प्रख्यात। उनकी एक कहानी है, बड़ी सुन्दर। एक कोई साहब थे, हज करके लौटे थे। तो हाजी लोग जरा समझते हैं कि हम भी कुछ हैं, जैसे चारों धाम करके आप लोगों में से कोई आवे, तो सबसे बातें करता है, हम चारों धाम गये थे। चारों धाम कर आये। जबरदस्ती बिना पूछे भी बोलेगा (हँसी)। तो उस हाजी से हज़रत जुनैदो ने पूछा कि तुम जब काबे की ओर चले, अपने घर से, मक्का मदीना की ओर, तो तुम खुदा की ओर बढ़े- ऐसा तुमको महसूस हुआ कि नहीं? नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। तो फिर तुम काबे की ओर गये ही नहीं, तुमको धोखा है। कई पड़ाव होते हैं, मक्का मदीना पहुँचने में उनके नियम हैं, कायदे कानून हैं। यहाँ पड़ाव पड़ा, फिर उसके बाद यहाँ पड़ाव पड़ा, फिर उसके बाद यहाँ पड़ाव पड़ा। कई पड़ाव के बाद फिर काबा पहुँचते हैं। तो जितने पड़ाव पड़े, उन पड़ावों पर तुमने यह रियलाइज़ किया, यह महसूस किया कि अब मैं खुदा के पास आ गया हूँ, अब मैं बहुत आगे बढ़ गया हूँ। अरे नहीं, मैं तो वैसे रहा नार्मल। तो तुमने पड़ाव किया ही नहीं। फिर? अच्छा, तुमने अहराम पहना? अहराम कहते हैं, ये जो सिले-सिलाये कपड़े आप लोग पहनते हैं, इसको निकाल करके बिना सिले कपड़े पहनते हैं, जो हज करने जाते हैं, मक्का मदीना में। तो वह बिना सिले कपड़े को जो ओढ़ते हैं, पहनते हैं, तो उसको अहराम कहते हैं। तो तुमने सिले-सिलाये कपड़े छोड़े और बिना सिले ओढ़े, तो उस समय तुमने बुराइयां छोड़ दी सब, क्या? नहीं, बुराई-वुराई तो नहीं छोड़ी। तुमने अहराम पहना ही नहीं। फिर वहाँ एक पहाड़ी है इरफ़ान नाम की। इरफ़ान नाम की पहाड़ी पर खड़ा हो करके आदमी और आँख बंद करके खुदा की इबादत करता है। भगवान् को नमस्कार करता है। तो जब तुम इरफ़ान की पहाड़ी पर खड़े हुये थे, तो उस समय क्या तुमने महसूस किया कि अब मैं खुदा के यहाँ पहुँच गया हूँ, अब दुनिया में मेरा कुछ भी नहीं है। नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ। तो तुम इरफ़ान की पहाड़ी पर खड़े ही नहीं हुये, इसका मतलब। वहाँ दो पहाड़ियाँ हैं सफा और मरवा। तो सफा और मरवा पहाड़ियों पर तुम दौड़े होंगे? यह सब बता रहा हूँ, कायदा है जो हज करने जाता है, सबको करना पड़ता है। तो सफा और मरवा पहाड़ियों में जब तुम दौड़े, तो सफा माने पाकी और मरवा माने मुरव्वत, दया, ये तुम्हारे अन्दर आई। तो ये तो कोई खास बात नहीं हुई। तो तुम उस पहाड़ी पर दौड़े ही नहीं, फिर। वहाँ एक जगह कुर्बानी करनी होती है, तुमने ख्वाहिशों की कुर्बानी की, इच्छाओं की कुर्बानी की। इच्छायें समाप्त हुईं, कुर्बानी करने के बाद? नहीं, कोई इच्छायें समाप्त नहीं हुईं। इच्छायें तो सब वैसी की वैसी हैं। फिर तुमने कुर्बानी की ही नहीं। तो हज करने में जितने नियम बनाये हैं- मुहम्मद साहब ने, अगर इनको ढंग से कोई करता तो खुदा का प्यारा हो जाता, भगवान का भक्त हो जाता, वह भगवत्प्राप्ति कर लेता, लेकिन वह नहीं किया, एक्टिंग सब की।*
*ऐसे ही हम लोग चारों धाम जाते हैं- वृन्दावन, मथुरा, यहाँ और वहाँ, वहाँ दान कर रहे हैं, वहाँ प्रणाम कर रहे हैं। सब नाटक कर आते हैं और लौट कर घर आते हैं तो अपने आपको देखते नहीं कि कहाँ हैं हम। जहाँ थे वहीं हैं, और एक अहंकार और बढ़ गया कि हम यह सब करके आये हैं। ये कमाई करते हैं हम लोग। यानि और गवाँ देते हैं। लोगों पर दुर्भावना, अपने में उच्च भाव- ये दो बड़े शत्रु हैं। दूसरे को छोटा समझना, अपने को बड़ा समझना, इससे बड़ा कोई अवगुण नहीं विश्व में हो सकता। स्वर्ण अक्षरों में लिख लो। जरा से ऑंसू आ गये आप लोगों में से किसी को, भगवान के लिये कीर्तन भजन में। हैं ऽऽऽ वह कुछ नहीं हैं, मेरे तो आँसू आये, मैं बड़ा हूँ। अरे, क्यों गड़बड़ करते हो? अगर गुरु कृपा, भगवत् कृपा से दो आँसू आ गये तो उनकी कृपा मानो। यह तुम्हारी बपौती नहीं है। एक सेकण्ड में छिन जायगी। बड़े-बड़े साधकों का सर्वनाश हो जाता है, तुम्हारी क्या गिनती है। हमेशा अपने को रीड करो, होशियार रहो, सावधान रहो। जैसे जब किसी शहर में कोई साईकिल से चलता है। कहां जाना है, यह भी याद है, पीछे से गाड़ी आ रही है बायें कर लो, बायें मोटर साईकिल जा रही है बीच में रखो, अब खडी कर दो, भई अब खतरा ज्यादा है। हर समय सावधान रहते हैं आप। जरा सी आपने गड़बड़ की, लापरवाही की, हुआ एक्सीडेंट । आप मर गये, या हाथ-पैर टूटा, फ्रैक्चर हो गया। लेकिन वहाँ आप सावधान रहते हैं, क्योंकि उसकी इम्पॉर्टेन्स है आपके मस्तिष्क में और भगवद् विषय का महत्व नहीं समझते आप। अधिक नहीं मानते तो इसलिये वहाँ लापरवाही चल रही है।*
-जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु महाप्रभु जी के प्रवचन का अंश।
No comments:
Post a Comment