१. प्रश्न :_ गुरु की शरणा गति सर्व प्रथम अनिवार्य है ?
अगर हम प्रचारक के शरण में जाते है तो हमारे लिये ठीक है ?
इन प्रचारक कों भगवत प्राप्ति हो गई हैं क्या ?
श्री महाराज जी :_ हमारे किसी भी प्रचारक कों भगवत प्राप्ति नहीं हुई है _ये बात आप सब लोग कान से सुनले, समझ लें ।मै आप लोगों को धोखा नहीं दे सकता । सब थेउरी का प्रचार करते है ( तत्व ज्ञान ) मै सारी इंडिया या विदेशों में जकर नहीं बोल सकता तो मैं इन लोगों को कहता हूँ की तुम लोग मेरा आदेश सुनाओं जनता को ।श्री कृष्ण कौन है ? राधा कौन है , जीव क्या हैं ? जीवका श्रीकृष्ण से क्या संबंध है,और उस संबंध के बाद क्या उपाय हैं_और फिर वो प्राप्ति के बाद क्या मिलता है । क्या परहेज करना है ।इस तमाम बातों को वो लोग प्रचार करते है ।अगर कोई प्रचारक अपने आप को गुरु रूप में De -clare- करता है तो वो हमारा द्रोही है । गुरु द्रोही है । हमने तो आज्ञा कर के रखे है कि कोई प्रचारक अपना चरण स्पर्श भी न करावे । तो फिर किसी प्रचारक को कोई गुरु मानेगा तो फिर मरे उसकी जिम्मेवारी हमारी ऊपर नहीं होगी। प्रचारक का काम है तत्वज्ञान कराना ।उसको आप लोग दस बार नहीं हजार बार सुनिये । बार बार श्रावण से ही तत्व ज्ञान दृढ होता है ।प्रचारक को भैया या दिदी दो ही भाव से देखिये । उसको महापुरुष या भगवान के भाव से न देखियेगा । अन्यथा सर्वनाश हो जायेगा । घोर पतन हो जाएगा और उसके जिम्मेवार तुम होंगे । गुरु तत्व जो है वो श्रोतिय ब्रह्म निष्ठ के लिये ही लागू होता है अर्थात् शास्त्र वेदाे का थेउरी का ज्ञान भी हो पलस श्री कृष्ण भगवान को साक्षात्कार भी हुवा हो । वो गुरु होने का योग्य होता है ।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ...!
श्री महाराज जी की प्रवचन से ....
राधे राधे 🙏
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