Thursday, 23 April 2020

Comparing oneself with others

साधक को कभी दूसरे की ओर देखना ही नहीं चाहिए क्योंकि हम जो देखेंगें , वह उसका बाह्य स्वरुप होगा | हम किसी के अंदर की बात को नहीं जान सकते | इस बात को समझाने के लिए श्री महाराज जी एक सेठजी का बड़ा सुन्दर प्रसंग सुनाया करते हैं जो इस प्रकार है -
एक सेठ जी थे | वे कभी भगवान का नाम न लेते और न मंदिर जाते | सेठानी परेशान रहती | एक दिन सोते समय अंगड़ाई लेते हुए सेठ जी के मुख से 'राधाऽऽऽ' निकला , जिसे सेठानी ने सुन लिया और जुट गई सवेरे-सवेरे दान - पुण्य की व्यवस्था में | ब्राह्मण भोज का इंतजाम होने लगा | सेठ जी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज न तो जन्माष्टमी है , न रामनवमी और न ही कोई अन्य त्योहार | इस प्रकार दान-पुण्य और ब्राह्मण भोज का क्या कारण हो सकता है ?
पत्नी से यह सुनते ही कि उनके मुख से ' राधे ' नाम निकल गया है, सेठजी के प्राण निकल गए |
भक्ति के तरीके सबके अपने-अपने हो सकते हैं | अब उपर्युक्त प्रसंग में देखिए न ! सेठजी इतने बड़े भक्त थे , किन्तु सेठानी उन्हे नास्तिक समझती थी | 
श्री महाराज जी का साधको के लिए  आदेश है -
' सदैव याद रखो | कोई व्यक्ति खराब हो , नामापराधी हो , पापी हो , उसके प्रति भी दुर्भावना न करो | क्या कोई ऐसा पापी है विश्व में , जिसके अंत:करण में भगवान श्रीकृष्ण न बैठे हों |' 
दुर्भावना द्वेष की जड़ है | द्वेष हमसे अनेक अपराध कराता है और हमारा ह्रदय पाषाण सम होने लगता है | गुरु के अथक प्रयास से जो भक्ति का अंकुर हमारे ह्रदय में फुटने लगता है , वह बारंबार इसकी आवृत्ति से कुम्हलाने लगता है इसलिए हमें सदा सावधान रहना चाहिए | ह्रदय में कोइ गलत चीज़ न आने पाये | जहाँ अच्छी चीज़ दिखाई पड़े , उसे अवश्य ग्रहण करना चाहिए | किन्तु जहाँ खराब चीज़ दिखाई पड़े , वहां सावधान रहना चाहिए कि पता नही क्या रहस्य है ! हम क्यों गलत भाव अपने मन में लाकर अपना मन गंदा करें | 
कौन उच्च कोटि का साधक है , कौन निम्न कोटि का अथवा कौन कब उच्च साधक हो जाए और कब किसका पतन हो जाए , कहना मुश्किल है | 
आपने तो सुना ही होगा अजामिल के विषय में ! एक क्षण के कुसंग ने उसको कितना बड़ा पापी बना दिया | 
बड़े - बड़े योगी का पतन हुआ , तो बड़े से बड़े पापी का संस्कार जागने पर उसे भगवत्प्राप्ति हुई | उसे भगवत्प्रेम मिला | कौन कब उठ जाए ? कौन कब गिर जाए ? कोई नही कह सकता | इसलिए कभी भी दूसरे के प्रति दुर्भावना नहीं करनी चाहिए | 
हमारे अंदर दुर्भावना पनपने का मुख्य कारण है - स्वयं की दुसरे से तुलना करना और अपने-आपको अच्छे होने का सर्टिफिकेट दे डालना | यही दुर्भावना साधना करने पर भी हमें आगे नहीं बढ़ने देती | सब जगह हम दूसरों के प्रति छोटी भावना कर लेतें हैं | तुच्छ भावना ! हमें इससे बचना चाहिए | हम अल्पज्ञ यह नही जान सकते कि हम सही हैं या नही | हममें यह क्षमता ही कहां ? 
    ---- श्री महाराज जी

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